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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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प्रस्तावना 'भारतीय' प्राचीन स्थापत्यकला के सुन्दर कलामय देवालयो, राजमहलो, किलाओ, जलाशयो, यंत्रो और मनुष्यालयो आदि अनेक मनोहर रचनाओ को देखकर अपना मन अतीव आनन्दित होता है। यही 'वास्तुशिल्प' है। वास्तु की उत्पत्ति के विषय मे अपराजितपृच्छा के सूत्र ५३ से ५५ तक मे विस्तार पूर्वक वर्णन लीखा है। उसका साराश यह कि—प्राचीन समय मे अंधकासुर नाम के राक्षस का विनाश करने के लिये महादेव को सग्राम करना पडा। उसके परिश्रम से महादेवजी के कपाल मे से पसीना का एक बिन्दु भूमि पर अग्निकुण्ड मे गिरा। इसके योग से वहा एक वडा भयकर विशालकाय भूत उत्पन्न हुआ, उसको देवोने औंधा पटक करके उसके विशालकाय शरीर के ऊपर पेंतालीस देव और आठ देविया ऐसे कुल ५३ देव बैठ गये और निवास करने लगें। जिसे अप० सू० ५५ श्लो० १२ मे कहा है कि 'निवास. सर्वदेवाना वास्तु वै स्थानतो विदुः ।' अर्थात् ये देवोका निवास होने से महाकाय भूत वास्तुपुरुष कहा जाता है। इसका वर्णन इसी ग्रथ के आठवें अध्याय मे श्लोक ६६ से ११४ तक किया गया है। यह प्रासाद मण्डन ग्रंथ शिल्पि‌वर्ग मे अधिक प्रशस्त है, इसके आधार पर आधुनिक सोमपुरा ब्राह्मण ज्ञातीय शिल्पि‌वर्ग देवालय बाधने का कार्य अपनी वंशपरपरा से करते आये है। यही इस ग्रंथ की विशेष महत्वता है और देवालयो की मुख्य चौदह जाति बतलाई हैं (देखो अध्या० १ श्लोक ६ठा का अनुवाद ), इनमे से नागर जाति के देवालय बाधने का यह प्रशस्त गंथ माना जाता है। इसमे देवालयो के गुणदोष और माप पूर्वक बाधने का सविस्तर वर्णन है। देवालय बनाने का महत्व— प्रासाद का अर्थ देवमदिर अथवा राजमहल होता है। उनमे से यह ग्रंथ देवमदिर के निर्माण विषय का है। इसको बनाने का कारण शास्त्रो मे लिखा है कि— "सुरालयो विभूत्यर्थं भूषणार्थं पुरस्य तु । नराणां भुक्तिमुक्त्यर्थं सत्यार्थ चैव सर्वदा ।। लोकानां धर्महेतुश्च क्रीडाहेतुश्च स्वर्भुवाम् । कीर्तिरायुर्यशोऽर्थं च राज्ञा कल्याणकारकः ॥” अप० सू० ११५ मनुष्यो के ऐश्वर्य के लिये, नगर के भूषणरूप श्रृंगार के लिये, मनुष्यो को अनेक प्रकार की भोग सामग्री को और मुक्तिपद को देनेवाला होनेसे, सब प्रकार की सत्यता की पूर्णता के लिये, मनुष्यो को धर्म का कारणभूत होने से, देवो को क्रीडा करने की भूमि होने से, कीर्ति, आयुष्य और यश की वृद्धि के लिये और राजाओ का कल्याण के लिये देवालय बनाया जाता है।