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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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सूत्रधार स्थपति— देवालय गृह आदि वास्तुशिल्प के काम करने वाले को सूत्रधार अथवा स्थपति कहा जाता है। चौदह राजलोक के देवोंने इकट्ठे होकर शिवलिंग के आकारवाली महादेवजी की अनेक प्रकार से पूजा की, जिससे प्रासाद की चौदह जाति उत्पन्न हुई इन प्रत्येक मे चोरस, लंबचोरस, गोल, लवगोल और अष्टास्र (आठ कोना वाली) ये पाच आकृतिवाले प्रासाद शिवजी के कथनानुसार ब्रह्माजी ने बनाये। इन प्रत्येक मे चोरस आकृति- वाले प्रासाद की ५८८, लबचोरस प्रासाद की ३००, गोल प्रासाद की ५००, लंबगोल प्रासाद की १५० और अष्टास्र प्रासाद की ३५० जाति भेद हैं। इनमे मिश्र जाति के प्रासादों के ११२ भेद मिलाने से दो हजार जाति के प्रासाद होते हैं। इन प्रत्येक के पच्चीस पच्चीस भेद होने से पचास हजार भेद होते हैं। इन प्रत्येक की आठ आठ विभक्ति होने से कुल चार लाख भेद प्रासाद के होते हैं। इनका सविस्त वर्णन जानने वाले को शास्त्रकारने स्थपति (सूत्रधार) कहा है। प्रासाद की श्रेष्ठता— भारतीय संस्कृति मे प्रासाद का अत्यधिक आदर किया जाता है, इतना ही नही परन्तु पूजनीय भी माना जाता है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि—प्रासाद को शिवलिंग का स्वरूप माना गया है। जैसे शिवलिंग को पीठिका है, वैसे प्रासाद को भी जगतीरूप पीठिका है। प्रासाद का जो चोरस भाग है, वह ब्रह्मा भाग है, उसके ऊपर का जो अष्टास्र भाग है, वह विष्णुभाग है और उसके ऊपर का जो गोल शिखर का भाग है, वह साक्षात् शिवलिंग स्वरूप है। दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि—प्रासाद के प्रत्येक अग और उपागो में देव और देवीयो का विन्यास करके देव प्रतिष्ठा के समय उसका अभिषेक किया जाता है। इसलिये प्रासाद सर्व देवमय बन जाता है। तीसरा कारण यह भी हो सकता है कि—प्रासाद के मध्य भूतल से धारिणी शिला के ऊपर से एक नाली (जिसको शास्त्रकार योगनाल अथवा ब्रह्मनाल कहते हैं और आधुनिक शिल्पी पद्मनाल कहते हैं) देव के सिंहासन तक रखने का विधान है। इसका कारण यह माना जाता है कि—प्रासाद के गर्भगृह के मध्य भाग से जलचर जीवो की आकृतिवाली धारणी नाम की शिला नींव मे स्थापित की जाती है, उसके ऊपर सुवर्ण अथवा चांदी का कूर्म (कछुआ) रख कर योगनाल रखी जाती है। इसका कारण यह हो सकता है कि—यह धारणी शिला के ऊपर जलचर जीवो की आकृतियो होने से यह शिला क्षीर समुद्र में शेषशायी भगवान स्वरूप माना गया, इसके नाभिकमल से उत्पन्न हुआ कमलदंड स्वरूप योगनाल है, इसके ऊपर ब्रह्मा की उत्पत्ति स्वरूप प्रतिष्ठित देव है। इत्यादि कारणो से प्रासाद का अधिक आदर किय जाता है। प्रासाद के निर्माण का फल— "स्वशक्त्या काष्ठमृद्दिष्टकाशैलधातुरत्नजम् । देवतायतनं कुर्याद् धर्मार्थकाममोक्षदम् ॥" अ० १. श्लो० ३३