प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऽष्टमोऽध्यायः १५५ सब मंडलो मे सर्वतोभद्र नामका मंडल प्रसिद्ध है, उसका तथा अन्य मंडलों का स्वरूप अन्यशास्त्र ( अपराजितपृच्छा सूत्र १४८ ) से जानें । यज्ञमंडप मे पूर्वादि दिशाओं मे अनुक्रम से पीपला, गूलर, बरगद और पीपल के पत्तो का तोरण बाधे ॥५३॥ ऋत्विजसंख्या— द्वात्रिंशत् षोडशाष्टौ च ऋत्विजो वेदपारगान् । कुलीनानङ्गसम्पूर्णान् यज्ञार्थमभिमन्त्रयेत् ॥५४॥ यज्ञ करने वाले बत्तीस, सोलह अथवा आठ ऋत्विज आमंत्रित होना चाहिये । ये सब वेदों के ज्ञाता हो, कुलवान् हों और अंगहीन न हों ॥५४॥ देवस्नान विधि— मण्डपस्य त्रिभागेन चोत्तरे स्नानमण्डपम् । स्थण्डिलं वालुकं कृत्वा शय्यायां स्नापयेत् सुरम् ॥५५॥ पञ्चगव्यैः कषायैश्च वल्कलैः क्षीरवृक्षजैः । स्नापयेत् पञ्चकलशैः शतवारं जलेन च ॥५६॥ मंडप की चारों दिशा मे तीन २ भाग करें, अर्थात् मंडप का नव भाग करे। ( आठ दिशा के आठ और एक मध्य वेदी का भाग जाने ) । इनमे उत्तर दिशा के भाग में स्नान मंडप बनावे । उसमे रेतीका शुद्ध स्थंडिल ( भूमि ) बनाकर उसके ऊपर शय्या मे देव की स्थापना करे । पीछे पंचगव्य से, कषाय वर्ग की औषधियो से और क्षीरवृक्षो की छालो के चूर्ण से स्नात्र- जल तैयार करें, उससे पाच २ कलश एकसौ बार भर करके देवको स्नान करावे ॥५५-५६॥ वेदमन्त्रैश्च वादित्रै-र्गीतमङ्गलनिःस्वनै । वस्त्रेणाच्छादयेद् देवं वेद्यन्ते मण्डपे न्यसेत् ॥५७॥ स्नान क्रिया के समय वेदमंत्रो के उच्चारणो से, वाजीत्र की ध्वनियो से और मागलिक गीतो से आकाश ध्वनिमान करे। स्नान के बाद देवको वस्त्रसे आच्छादित करके, पीछे ईशानकोन की वेदी के ऊपर स्थापित करें ॥५७॥ देवशयन— तल्पमारोपयेद् वेद्या-मुत्तराङ्गी न्यसेत् ततः । कलशं तु शिरोदेशे पादस्थाने कमण्डलुम् ॥५८॥