भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 203

१५४ प्रासादमण्डने और ईशानकोणमे अष्टकोण, ये आठ पूर्वदिशासे ईशानकोण तक आठ दिक्पालों के कुण्ड है । तथा पूर्व और ईशान के मध्य भाग मे नवा प्राचार्य कुण्ड गोल अथवा समचोरस बनावें । 'विशेष जानने के लिये देखे मंडपकुं'डसिद्धि आदि ग्रंथ ।' मंडल— एकद्वित्रिकरं कुर्याद् वेदिकोपरि मण्डलम् । ब्रह्मविष्णुरवीणां च सर्वतोभद्रमिष्यते ॥४८॥ वेदिकाके ऊपर एक, दो अथवा तीन हाथ के मानका मंडल बनावें । ब्रह्मा, विष्णु और सूर्य की प्रतिष्ठा मे सर्वतोभद्र नामका मंडल बनावे ॥४८॥ भद्रं तु सर्वदेवानां नवनाभिस्तथा त्रयम् । लिङ्गोद्भवं शिवस्यापि लतालङ्गोद्भवं तथा ॥४६॥ सब देवों की प्रतिष्ठा में भद्र नाम का मंडल, तथा नवनाभी अथवा तीन नाभि वाला लिंगोद्भव मंडल बनावे । शिव की प्रतिष्ठा में लिंगोद्भव तथा लतालिङ्गोद्भव नाम का मंडल बनावे ॥४९॥ भद्रं च गौरीतलकं देवीनां पूजने हितम् । अर्धचन्द्रं तडागेषु चापाकारं तथैव च ॥५०॥ सब देवियों की पूजन प्रतिष्ठा मे भद्र और गौरीतिलक नाम का मंडल बनावें । तथा तालाब की प्रतिष्ठा में अर्धचंद्र चापाकार मंडल बनावे ॥५०॥ टङ्काभं स्वस्तिकं चैव वापीकूपेषु पूजयेत् । पीठिकाजलपट्टेषु योन्याकारं तु कामदम् ॥५१॥ वावडी और कुओ की प्रतिष्ठा मे टंकाभ और स्वस्तिक मंडल का पूजन करे । पीठिका और जलपट्ट की प्रतिष्ठा मे योनि के आकार का मंडल पूजने से सब कार्य सिद्ध होते है ॥५१॥ गजदन्तं महादुर्गे प्रशस्तं मण्डलं यजेत् । टङ्काभं चतुरस्रं च गजदन्तं महायतम् ॥५२॥ बड़े किले की प्रतिष्ठा मे गजदंत नामका मंडल पूजन करना प्रशस्त है । टंकाभ मंडल का आकार चोरस है और गजदंत मंडल का आकार लंबा है ॥५२॥ विख्यातं सर्वतोभद्रं ज्ञेयमन्योऽन्यलोकतः । पूर्वादितोरणं प्लक्ष-यज्ञाश्वत्थटपिप्पलैः ॥५३॥