भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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ऽष्टमोऽध्यायः १५३ सोलह स्तंभ वाला और तोरणों से शोभायमान बनावे । तथा मंडप के मध्य मे वेदिका और पाच, आठ अथवा नव यज्ञ कुण्ड बनावे ॥४१ से ४३॥ यज्ञकुण्ड का मान— हस्तमात्रं भवेत् कुण्डं मेखलायोनिसंयुतम् । आगमैर्वेदमन्त्रैश्च होमं कुर्याद् विधानतः ॥४४॥ तीन मेखला और, योनि से युक्त ऐसा एक हाथ के मानका यज्ञकुण्ड बनावे । उसमे आगम और वेद के मंत्रो से विधिपूर्वक होम करे ॥४४॥ आहुति संख्या से कुण्डमान— अयुते हस्तमात्र स्याद् लक्षार्द्धं तु द्विहस्तकम् । त्रिहस्तं लक्षहोमे स्याद् दशलक्षे चतुष्करम् ॥४५॥ त्रिशल्लक्षे पञ्चहस्तं कोट्यर्द्धं षट्करं मतम् । अशीतिलक्षेऽद्रिकरं कोटिहोमे कराष्टकम् ॥४६॥ ग्रहपूजाविधाने च कुण्डमेककरं भवेत् । मेखलास्त्रितयं वेद-रामयुग्माङ्गुलैः क्रमात् ॥४७॥* दस हजार आहुति के लिये एक हाथ का, पचास हजार आहुति के लिये दो हाथ का, एक लाख आहुति के लिये तीन हाथ का, दस लाख आहुति के लिये चार हाथ का, तीस लाख आहुति के लिये पाच हाथ का, पचास लाख आहुति के लिये छह हाथ का, अस्सी लाख आहुति के लिये सात हाथ का और एक करोड आहुति देना हो तो आठ हाथ का कुण्ड बनावे । ग्रहपूजा आदि के विधान मे एक हाथ के मान का कुण्ड बनावे । कुण्ड की तीन मेखला क्रमश. चार, तीन और दो अंगुल के मान को रखें ॥४५ से ४७॥ दिशानुसार कुण्डों की आकृति— “प्राच्याञ्चतुष्कोणभगेन्दुखण्ड-त्रिकोणवृत्ताङ्गभुजाग्बुजानि । अष्टास्रिशक्रेश्वरयोस्तु मध्ये, वेदास्रि वा वृत्तमुशन्ति कुण्डम् ॥”३२॥ इति मंडपकुं डसिद्धौ पूर्व दिशा मे समचोरस, अग्निकोण मे योन्याकार, दक्षिण दिशा मे अर्द्धचन्द्र, नैऋ- त्यकोण मे त्रिकोण, पश्चिमदिशा में गोल, वायव्यकोण मे छह कोण, उत्तर में अष्टदल पद्माकार

  • विशेष जानने के लिये देखो अपराजितपृच्छा सूत्र १४१ । प्रा० २०