प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऽष्टमोऽध्यायः १५७ वज्री ( वज्रदंती ), वह्नि ( चित्रक ), सहदेवी, विष्णुकान्ता, इन्द्रवारुणी, शंखाहुली, ज्योतिष्मती ( मालकागनी ) और शिवलिंगी, ये आठ औषधियां पूर्वादि दिशाओं में सृष्टिक्रम से रक्खे ॥६३॥ धान्यन्यास— यवो व्रीहिस्तथा कङ्गु-जूर्णाहा च तिलैर्युताः । शाली मुद्गाः समाख्याता गोधूमाश्च क्रमेण तु ॥६४॥ जव, व्रीहि, कगु, जुआर, तिल, शाली, मूंग और गेहू, ये आठ धान्य पूर्वादि दिशाओ मे सृष्टिक्रम से रक्खे । आचार्य और शिल्पियो का सन्मान— यद्देवाभरणं पूजा वस्त्रालङ्कारभूषणम् । तत्सर्वं शिल्पिने दद्याद् आचार्याय तु याज्ञिकम् ॥६५॥ देवसंस्कार के लिये जो वस्त्र और अलंकार आदि आभूषण चढाया जाता है, वे सब शिल्पिको देना चाहिये और आचार्य को यज्ञ संबन्धी सब वस्तु देनी चाहिये ॥६५॥ ततो महोत्सवं कुर्यान्नृत्यगीतैरनेकशः । नैवेद्यारात्रिकं पूजा-मङ्गन्यासादिकं तथा ॥६६॥ पीछे अनेक प्रकार के नृत्य और गीत पूर्वक महोत्सव करे, नैवेद्य चढावे, आरती करे और अंगन्यास ( मुद्रा न्यास ) आदि करे ॥६६॥ क्षीरं क्षौद्रं घृतं खण्डं पक्वान्नानि बहून्यपि । षड्रसस्वादुभक्ष्याणि सन्मानं परिकल्पयेत् ॥६७॥ दूध, शहद, घी, खांड और अनेक प्रकार के पकवान, तथा षड्रस के स्वाद वाले भोजन पदार्थ, ये सन्मान पूर्वक देव के आगे रखने चाहिये ॥६७॥ विप्राणां सम्प्रदायैश्च वेदमन्त्रैस्तथागमैः । सकलीकरणं जीवन्यासं कृत्वा प्रतिष्ठयेत् ॥६८॥ पीछे ब्राह्मण अपने सम्प्रदाय के अनुसार वेद ंत्रो से तथा आगम मंत्रो से सकलीकरण करके देवमे जीवन्यास करें । पीछे प्रतिष्ठित करे ॥६८॥