प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ प्रासादमण्डने प्रासाददेव न्यास— प्रासादे देवतान्यासं स्थावरेषु पृथक् पृथक् । खरशिलायां वाराहं पौल्यां नागकुलानि च ॥६६॥ प्रासाद के थरों और अंगोपांगो में अलग २ देवों का न्यास करके पूजन करें । खरशिला में वाराह देव और भीट के थर मे नागदेव का न्यास करे ॥६६॥ प्रकुम्भे जलदेवांश्च पुष्पके किन्नुरांस्तथा । १नन्दिनं जाड्यकुम्भे च कर्णिकायां स्थापयेद्धरिम् ॥७०॥ कुम्भ के थर मे जलदेव, पुष्पकंठ के थर मे किन्नरदेव, जाड्यकुम्भ मे नंदीदेव, और कर्णिका के थर मे हरिदेव का न्यास करें ॥७०॥ गणेशं गजपीठे स्या-दश्वपीठे तथाश्विनौ । नरपीठे नरांश्चैव च्क्ष्मां च खुरके यजेत् ॥७१॥ गजपीठ में गणेश, अश्वपीठ में दोनों अश्विनीकुमार, नरपीठ में नरदेव और खुरा के थर मे पृथ्बीदेवी का न्यास करके पूजन करें ॥७१॥ भद्रे संध्यात्रयं २कुम्भे पार्वतीं कलशे स्थिताम् । कपोताल्यां च गान्धर्वान् मञ्चिकायां सरस्वतीम् ॥७२॥ भद्र के कुम्भ मे तीन सध्यादेवी, कलश के थर मे पार्वतीदेवी, केवाल के थर में गांधर्वदेव और मांची के थर में सरस्वती देवी का न्यास करें ॥७२॥ जङ्घायां च दिशिपाला-निन्द्रमुद्गमे संस्थितम् । सावित्रीं भरणीदेशे शिरावट्यां च देविकाम् ॥७३॥ जंघा के थर मे दिक्पाल, उद्गम के थर मे इन्द्र, भरणी के थर में सावित्री और शिरावटी के थर मे भाराधार देवी का न्यास करें ॥७३॥ विद्याधरान् कपोताल्या-मन्तराले सुरांस्तथा । पर्जन्यं कूटच्छाद्ये च ततो मध्ये प्रतिष्ठयेत् ॥७४॥ केवाल के थर मे विद्याधर, अंतराल के थर मे किन्नरादि सुर और छज्जा के थरमें पर्जन्य ( मेघ ) देव, इनका न्यास करे । अब भीतर के मध्य भाग में देवों का न्यास कहते है ॥७४॥ १. 'नन्दिनी' । २. 'सप्तारं कुम्भके' अप० सू० १५० श्लो० ८ ।