भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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ऽष्टमोऽध्यायः १६३ प्राचीन समय में जब महादेव ने अंधक नाम के दैत्य का विनाश किया, उस समय परिश्रम से महादेव के ललाट में से पसीना की विन्दु पृथ्वो के ऊपर पड़ी । इस विन्दु से एक अत्यन्त भयंकर भूत उत्पन्न हुआ । उसको देवों ने शीघ्र ही पकड़ करके पृथिवी के ऊपर इस प्रकार से औंधा गिरा दिया, कि उसकी दोनो जानु और हाथ की दोनो कोन्ही वायु और अग्नि कोने में, चरण नैऋृत्य कोने में और मस्तक ईशान कोने में रहा ॥६६-६७॥ चत्वारिंशद्युताः पञ्च वास्तुदेहे स्थिताः सुराः । देव्योऽष्टौ बाह्यगास्तेषां वसनाद्वास्तुरुच्यते ॥६८॥ इस औंधे पड़े हुए वास्तुपुरुष के शरीर पर पैंतालीस देव स्थित हो गये और उसके चारो कोने पर आठ देवियां भी स्थित हो गईं । इस प्रकार तरेपन (५३) देव उस भूत के शरीर पर निवास करते हैं, इसलिये उसको वास्तु पुरुष कहते है ॥६८॥ अधोमुखेन विज्ञप्तौ त्रिदशान् विहितो बलिम् । तेनैव बलिना शान्ति करोति हानिमन्यथा ॥६६॥ प्रासादभवनादीनां प्रारम्भे परिवर्त्तने । वास्तुकर्मसु सर्वेषु पूजितः सौख्यदो भवेत् ॥१००॥ अधोमुख करके रहा हुआ वास्तु पुरुष देवो को विनति करता है कि—जो मनुष्य मेरे ऊपर बैठे हुए देवो को विधिपूर्वक बलि देवेगा, तो उस बलिके प्रभाव से मै उसको शान्ति प्रदान करूंगा और बलि नही देने पर तो हानि करूंगा। इसलिये प्रासाद और भवन आदि के सब वास्तु कर्म के प्रारम्भ से सम्पूर्ण होने तक सब वास्तु कर्म मे वास्तु पूजन करने से सुखशांति होवेगी ॥६६-१००॥ एकपदादितो वास्तुर्यावत्पदसहस्रकम् । द्वात्रिंशन्मण्डलानि स्युः क्षेत्रतुल्याकृतीनि च ॥१०१॥ एक पदसे लेकर एक हजार पद तक का वास्तु बनाने का विधान है । वास्तुपूजन के बत्तीस मंडल है, वे क्षेत्र की आकृति के अनुसार आकृति वाले है ॥१०१॥ A एकाशीतिपदो वास्तुश्चतुःषष्टिपदोऽथवा । सर्ववास्तुविभागेषु पूज्येन्मण्डलद्वयम् ॥१०२॥ A सविस्तार जानने के लिये देखें । अपराजित पृच्छा सूत्र ५७ और ५८ वा ।