भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

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१६४ प्रासादमण्डने वास्तु पूजन के बत्तीस मंडलों में से इक्यासीपद का और चौसठ पद का, ये दो मंडल पूजने चाहिये ॥१०२॥* वास्तुपुरुष के ४५ देव— ईशो मूर्धनि पर्जन्यो दक्षिणकर्णमाश्रितः । जयः स्कन्धे महेन्द्राद्याः पञ्च दक्षिणबाहुगाः ॥१०३॥ 'महेन्द्रादित्यसत्याश्च भृश आकाशमेव च । वास्तुपुरुष चक्र — [मण्डल-देवता: चरकी, विदारी, पूतना, पापराक्षसी, ईश, पर्जन्य, जय, इन्द्र, सूर्य, सत्य, भृश, आकाश, अग्नि, पूषा, वितथ, गृहक्षत, यम, गन्धर्व, भृङ्ग, मृग, पितृ, नन्दि, सुग्रीव, पुष्पदन्त, वरुण, असुर, शेष, दौवारिक, रोग, नाग, मुख्य, भल्लाट, कुबेर, सोम, दिति, अदिति, आप, आपवत्स, सविता, सावित्र, विवस्वत, मित्र, रुद्र, रुद्रदास, पृथ्वीधर, ब्रह्मा] वास्तुपुरुष के मस्तक पर ईशदेव, दाहिने कान पर पर्जन्यदेव, दाहिने स्कंध पर जयदेव और दाहिनी भुजा पर इन्द्र आदि पांच—इन्द्र, सूर्य, सत्य भृश और आकाश देव स्थित हैं ॥१०३॥ वह्निर्जानुनि पुषाद्याः सप्त पादनलीस्थिताः ॥१०४॥ *विशेष जानने के लिये देखें राजवल्लभ मंडन अध्याय २. १. 'महेन्द्रः सूर्यः सत्यश्च ।'