प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऽष्टमोऽध्यायः १६५ पुपाथ वितथश्चैव गृहक्षतो यमस्तथा । ' गन्धर्वो भृङ्गराजश्च मृगः सप्त सुरा इति ॥१०५॥ अग्निकोण मे जानुके ऊपर अग्नि देव और दाहिने पैर की नलीके ऊपर पुषा आदि सात देव—पुषा, वितथ, गृहक्षत, यम, गान्धर्व, भृगराज और मृग, ये सात देव स्थित है ॥१०४-१०५॥ पादयोः पितरस्तस्मात् सप्त पादनलीस्थिताः । दौवारिकोऽथ सुग्रीवः पुष्पदन्तो जलाधिपः ॥१०६॥ 'असुरशोषयक्ष्माश्च रोगो जानुनि संस्थितः । नागो मुख्यश्च भल्लाटः सोमो गिरिश्च बाहुगाः ॥१०७॥ दोनो पैरके ऊपर पितृदेव, बाये पैरकी नली पर दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदत, जलाधिप (वरुण), असुर, शोष, और पापयक्ष्मा ये सात देव स्थित है। नाग, मुख्य, भल्लाट, कुबेर और गिरि (शैल), ये पाच देव बाबी भुजा पर स्थित है ॥१०६-१०७॥ अदितिः स्कन्धदेशे च वामे कर्णे दिति. स्थितः । द्वात्रिंशद्वाह्यगा देवा नाभिष्पृष्ठे स्थितो विधिः ॥१०८॥ बाये स्कंध पर अदिति देव और बाये कान पर दितिदेव स्थित है। इस प्रकार बत्तीस देव वास्तुपुरुष के बाह्य अंगों पर है। मध्य नाभि के पृष्ठ भाग मे ब्रह्मा स्थित है ॥१०८॥ अर्यमा दक्षिणे वामे स्तने तु पृथिवीधरः । विवस्वानऽथ , मित्रश्च दक्षवामोरुगावुभौ ॥१०६॥ दाहिने स्तन पर अर्यमा और बाये स्तन पर पृथ्वीधर देव स्थित है। दाहनी ऊरु पर विवस्वान् और बायी ऊरु पर मित्रदेव स्थित है ॥१०६॥ आपस्तु गलके वास्तो-रापवत्सो हृदि स्थितः । २सावित्री सविता तद्वत् करं दक्षिणमाश्रितौ ॥११०॥ वास्तुपुरुष के गले पर आपदेव, हृदय के ऊपर आपवत्स देव स्थित है। दाहिने हाथ पर सावित्री और सविता ये दो देविया स्थित है ॥११०॥ इन्द्र इन्द्रजयो मेढ़े रुद्रोऽसौ वामहस्तके । रुद्रदासोऽपि तत्रैव इति देवमयं वपुः ॥१११॥ १. 'शेष ।' २. 'सावित्र' ।