प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ प्रासादमण्डने मेढ्र (लिंग) स्थान पर इन्द्र और इन्द्रजय देव स्थित है। बायें हाथ पर रुद्र और रुद्रदास देव स्थित है ! इस प्रकार कुल पैंतालीस देवमय वास्तुपुरुष का शरीर है ॥१११॥ वास्तुमंडल के कोने की आठ देवियां— ऐशान्ये चरकी बाह्ये पीलीपीच्छा च पूर्वदिक् । विदारिकाग्निकोणे च जम्भा याम्यदिशाश्रिता ॥११२॥ नैर्ऋत्ये पूतना स्कन्दा पश्चिमे वायुकोणके । पापराक्षसिका सौम्येऽर्यमैवं सर्वतोऽर्चयेत् ॥११३॥ वास्तुमंडल के बाहर ईशानकोने में उत्तर दिशा में चरकी और पूर्व में पोलीपीच्छा, अग्निकोने मे पूर्व में विदारिका और दक्षिण में जम्भा देवी, नैर्ऋत्यकोने मे दक्षिण मे पूतना और पश्चिम मे स्कन्दा, वायुकोने में पश्चिम मे पापराक्षसिका और उत्तर में अर्यमा देवी का न्यास करके पूजन करे ॥११२-१३॥ देवीः क्रूरान् यमादींश्च माषान्नैः सुरयामिषैः । अपरान् घृतपक्वान्नैः सर्वान् स्वर्णसुगन्धिभिः ॥११४॥ इति वास्तुपुरुषविन्यासः । देवियो को और यम आदि क्रूर देवो को माषान्न, सुरा और आमिष से और बाकी के सब देवो को घृत, पक्वान, सुवर्ण और सुगंधित पदार्थों से पूजना चाहिये ॥११४॥ शास्त्रप्रशंसा— एकेन शास्त्रेण गुणाधिकेन, विना द्वितीयेन पदार्थसिद्धिः । तस्मात् प्रकारान्तरतो विलोक्य, मणिर्गुणाढ्योऽपि सहायकाङ्क्षी ॥११५॥ इस ग्रन्थ के कर्त्ता श्रीमण्डनसूत्रधार का कहना है कि—शिल्पशास्त्र अनेक है। उनमें यह एक ही शास्त्र अधिक गुणवाला होने पर भी दूसरे शिल्पशास्त्र देखे बिना पदार्थ की सिद्धि नही होती, इसलिये प्रकारान्तर से दूसरे शिल्पग्रन्थ भी देखने चाहिये। जैसे—अकेला मणि अधिक गुणवाला होने पर भी इतनी शोभा नही देता जितनी सुवर्णादि अन्य पदार्थों के साथ मिलाने से देता है। इसी प्रकार शिल्प के अनेक शास्त्र देखने से शिल्पी शिल्पशास्त्र का विद्वान् होता है ॥११५॥