प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ प्रासादमण्डने ५-नन्दीशप्रासाद— त्रिभागं च भवेद् भद्रं भद्रार्थं प्ररथस्तथा । कर्णे शृङ्गद्वयं भद्रे एकैकं प्ररथे तथा ॥१९॥ इति नन्दीशप्रासादः ॥५॥ यह नन्दीशप्रासाद का मान और स्वरूप सर्वतोभद्र प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष यह है कि—छः भाग का भद्र है, उसके बदले तीन भाग का भद्र और डेढ़ २ भाग का प्रतिरथ बनावें। कोणे के ऊपर दो २, भद्र के ऊपर एक २ और प्रतिरथ के ऊपर एक २ शृंग चढ़ावे ॥१९॥ शृंगसंख्या—कोणे ८, प्ररथे ८, भद्रे ४ और एक शिखर, एवं कुल २१ शृंग । ६-मंदरप्रासाद— द्वादशांशस्तु विस्तारो मूलगर्भस्तदर्धतः । भागभागं तु कर्त्तव्या द्वे भित्ती चान्धकारिका ॥२०॥ कर्णप्ररथभद्रार्धं कारयेद् द्विद्विभागतः । प्ररथः समनिष्कासो भद्रं भागेन निर्गमम् ॥२१॥ कर्णे द्वे भद्रके द्वे च चैकं प्रतिरथे तथा । सघण्टा कलशा रेखा रथिकोद्गमभूषिताः ॥२२॥ इति मन्दरप्रासादः ॥६॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बारह भाग करें। उनमें से छः भाग का गभारा बनावें, तथा एक २ भाग की दोनों दीवार और एक २ भाग की भ्रमणी (परिक्रमा) बनावें। गभारे के बाहर के भाग में कोणा, प्ररथ और भद्रार्ध ये सब दो २ भाग का रक्खें । उसका निर्गम समदल रक्खें और भद्रका निर्गम एक भाग रक्खें। कोणे के ऊपर दो २ शृंग, भद्रके ऊपर दो २ उरशृंग और प्रतिरथ के ऊपर एक २ शृंग चढ़ावें । आमलसार, कलश, रेखा, गवाक्ष और उद्गम, ये सब शोभायमान बनावें ॥२० से २२॥ शृंगसंख्या—कोणे ८, प्ररथे ८ भद्रे ८ और एक शिखर, एव कुल २५ शृंग ।