भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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परिशिष्टे केसरीप्रासादः १३६ ७-श्रीवृक्षप्रासाद— चतुर्दशांशविस्तारे गर्भगृहाष्टांशविस्तरः । भागभागं भ्रमो भित्ति-स्तारनिर्गमनेस्तु भागिकः ॥२३॥ कर्णे शृङ्गद्वयं कुर्या-च्छिखरं चाष्टभिर्भगम् । प्रत्यः कर्णमानेन तिलकं शृङ्गकेशरी ॥२४॥ नन्दिकायां च तिलकं भद्रे शृङ्गद्वयं भवेत् । श्रीवृक्षस्तु समाख्यातः कर्त्तव्यस्तु श्रियः पतेः ॥२५॥ इति श्रीवृक्षप्रासादः ॥७॥ प्रासाद को समचोरस भूमिहा चौदह भाग करें। उनमें से आठ भागका गभारा, एक भागकी दीवार, एक भागकी भ्रमन्ती और एक भागकी बाहर की दीवार, इस प्रकार भीतर १४ भाग होता है। बाहर का मान नंदर प्रासाद के अनुसार होता है। विशेष इतना कि—दो भाग का कोणा, २ भाग का प्रतिरथ, एक भागकी नंदी, और दो भाग का भद्रारि रखो। कोने के ऊपर दो शृंग, प्रतिरथ के ऊपर एक शृंग और एक तिलक बांधे। शिखर का विस्तार आठ भाग का रखो। नंदीके ऊपर एक तिलक रक्खे। भद्रके ऊपर तीन २ उरुशृंग बांधे। ऐसा श्रीवृक्षप्रासाद का स्वरूप है, यह विष्णु के लिए बांधे ॥२३ से २५॥ शृंगसंख्या—कोणे ८, प्रतिरथे ८, भद्रे १२, एक शिखर, एवं कुल २९ शृंग। तिलक संख्या-प्रतिरथे ८ और नंदीपर ८ एवं कुल १६ तिलक। ८-अमृतोद्भवप्रासाद— कर्णे शृङ्गत्रयं कुर्यात् प्रत्यः पूर्ववत्स्थितः । अमृतोद्भवनामोऽसौ प्रासादः सुरपूजितः ॥२६॥ इति अमृतोद्भवप्रासादः ॥८॥ यह प्रासाद का तजमान और रचना श्रीवृक्षप्रासाद के अनुसार जानना। फर्क इतना कि—कोण के ऊपर तीन शृङ्ग चढ़ावे, बाकी प्रतिरथ आदिक का रचना पूर्वोक्त प्रकार ही करा जाने । ऐसा अमृतोद्भवप्रासाद देवों से पूजित है ॥२६॥