भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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१७६ प्रासादमण्डने कर्णे शृङ्गद्वयं कार्यं शिखरं सूर्यविस्तरम् । नन्दिकायां तु तिलकं प्रत्यङ्गं च द्विभागिकम् ॥३४॥ शृङ्गद्वयं प्रतिरथे उरुशृङ्गं षडंशकम् । १शृङ्गद्वयं नन्दिकाया-मुरःशृङ्गं युगांशकम् ॥३५॥ द्विभागं भद्रशृङ्गं तु शृङ्गार्धे चैव निर्गमः । कर्णे प्रतिरथे चैव ह्युदकान्तरभूषितम् ॥३६॥ इन्द्रनीलस्तदा नाम इन्द्रादिसुरपूजितः । वल्लभः सर्वदेवानां शिवास्यापि विशेषतः ॥३७॥ इति इन्द्रनीलप्रसादः ॥१३॥ कोणों के ऊपर दो शृंग चढ़ावें। शिखर का विस्तार बारह भाग रखें। नन्दी के ऊपर एक तिलक चढ़ावें और दो भाग के विस्तार वाला प्रत्यंग चढ़ावे। प्रतिरथ के ऊपर दो शृंग चढ़ावें। पहला उरुशृंग छ भाग विस्तार में रक्खे। नन्दी के ऊपर एक शृंग चढ़ावें। दूसरा उरुशृंग विस्तार में चार भाग का और तीसरा उरुशृंग विस्तार में दो भाग का रखें। इन उरुशृंगों का निर्गम विस्तार से आधा रखें। कोणा और प्रतिरथ उदकान्तर वाला बनावें। ऐसा इन्द्रनील प्रासाद इन्द्रादि देवों से पूजित है, यह सब देवों को और विशेष कर शिवजी को प्रिय है ॥३४ से ३७॥ शृंग संख्या—कोणो ८, प्रतिरथे १६, भद्र नन्दी के ऊपर ८, भद्रे १२, प्रत्यंग ८, एक शिखर, कुल ५३ शृंग और तिलक ८ कर्णा नन्दी पर। १४-महानील प्रसाद- कर्णे नन्दी (कर्णनन्द्यां ?) तथा शृङ्गं रेखोर्ध्वे तिलकं तथा । महानीलस्तदा नाम कर्त्तव्यः सर्वदैवते ॥३८॥ इति महानीलप्रसादः ॥१४॥ १. 'शृंगद्वयं' अशुद्ध पाट मालुम होता है। उस स्थान पर 'शृङ्गमेकं' ऐसा पाठ चाहिये जिसे शृंगों की संख्या ठीक मिल जाय ।