भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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परिशिष्टे केसरीप्रासादः १७५ तथा कोणो के ऊपर तीन शृंग हैं, उसके बदले दो शृंग और उसके ऊपर तिलक चढ़ाना चाहिये । ऐसा कैलास नामका प्रासाद ईश्वर को हमेशा प्रिय है ॥२६॥ शृंगसंख्या—कोणे ८, पठरे १६, नंदी पर ८, भद्रे १२, एक शिखर, एवं कुल ४५ शृंग और तिलक ८ कोने और ८ नन्दी के ऊपर । १२-पृथिवीजय प्रासाद— रेखोर्ध्वे तिलकं त्यक्त्वा शृङ्गं तत्रैव कारयेत् । पृथ्वीजयस्तदा नाम कर्त्तव्यः सर्वदैवते ॥३०॥ इति पृथ्वीजयप्रासादः ॥१२॥ यह प्रासाद का तलमान और स्वरूप कैलासप्रासादकी तरह जाने । विशेष यह है कि— कोणेके ऊपर का तिलक हटाकर के उसके बदले शृंग चढ़ावे । ऐसा पृथ्वीजय नामका प्रासाद सब देवों के लिये बनावे ॥३०॥ शृंगसंख्या—कोणे १२, प्रतिरथे १६, नंदी के ऊपर ८, भद्रे १२, एक शिखर, एवं कुल ४६ शृंग और तिलक ८ नंदी के ऊपर । १३-इन्द्रनीलप्रासाद— षोडशांशकविस्तारे द्विभागः कर्णविस्तरः । नन्दिका चैकभागेन द्वयं'शः प्रतिरथस्तथा ॥३१॥ पुनर्नन्दी भवेद् भागं भद्रं वेदांशविस्तरम् । समस्तं समनिष्कासं भद्रे भागो विनिर्गमः ॥३२॥ प्रासाद की समचोरस भूमि का सोलह भाग करे । उनमे से दो भाग का कोणा, एक भागकी नन्दी, दो भागका प्रतिरथ, एक भाग की दूसरी नन्दी और दो भागका भद्रार्ध बनावे । ये सब अंगोका निर्गम समदल और भद्रका निर्गम एक भाग रक्खे ॥३१-३२॥ चतुष्ट्यंशको गर्भो वेष्टितो भीत्तिभागतः । बाह्यभीत्तिर्भवेद् भागा द्विभागा च भ्रमन्तिका ॥३३॥ सोलह भाग मे गभारे का विस्तार आठ भाग ( समचोरस ६४ भाग ) करे गभारे की दीवार एक भाग, भ्रमणो दो भाग और बाहर की दीवार एक भाग रक्खें ॥३३॥