प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० प्रासादमण्डने पुनर्नन्दी सार्धभागा भागा वै भद्रनन्दिका । वेदांशो भद्रविस्तार एकभागस्तु निर्गमः ॥५०॥ द्विभागा बाह्यभित्तिश्च द्विभागा च भ्रमन्तिका । तत्समा मध्यभित्तिश्च गर्भोऽष्टांशैः प्रकल्पितः ॥५१॥ इस प्रासाद की समचोरस भूमिका बीस भाग करें। उनमें से दो भाग का कोणा, डेढ़ भाग की नंदी, दो भाग का प्ररथ, डेढ़ भाग की नदी, एक भाग की भद्रनन्दी और चार भाग का भद्र का विस्तार रखें। भद्र का निर्गम एक भाग का रखें। दो भाग बाहर की दीवार, दो भाग की भ्रमणी, दो भाग की गभारे की दीवार और आठ भाग का गभारा रखें ॥४६ से ५१॥ कर्णो द्विशृङ्गं तिलकं रेखा द्विसप्तविस्तरा । नन्द्यां शृङ्गं च तिलकं प्रत्यङ्गं तदूर्ध्वतः ॥५२॥ शृङ्गत्रयं प्रतिकर्णो सप्तांशा चोरुमञ्जरी । नन्द्यां शृङ्गं च तिलक-मुरुशृङ्गं षडंशकम् ॥५३॥ भद्रनन्द्यां तथा शृङ्ग-मिषुभागोरुमञ्जरी । भद्रशृङ्गं द्विभागं स मुकुटोज्ज्वल उच्यते ॥५४॥ इति मुकुटोज्ज्वलप्रासादः ॥२०॥ रेखा का विस्तार चौदह भाग का रखे। कोण के ऊपर दो शृंग, और एक तिलक, कर्णनंदी के ऊपर एक शृंग और एक तिलक, ऊपर प्रत्यंग, प्ररथ के ऊपर तीन शृंग, नंदीके ऊपर एक शृंग और एक तिलक, भद्रनन्दी के ऊपर एक शृंग और भद्र के ऊपर चार शृंग चढावे। पहला उरुशृंग सात भाग का, दूसरा उरुशृंग छः भाग का, तीसरा उरुशृंग पांच भाग का और चौथा उरुशृंग दो भाग का रखे। ऐसा मुकुटोज्ज्वल प्रासाद है ॥५२ से ५४॥ शृंगसंख्या—कोणे ८, प्रत्यंग ८, कर्णनन्दी पर ८, प्ररथे २४, नंदी पर ८, भद्रनन्दी पर ८, भद्रे १६, एक शिखर, कुल ८१ शृंग। तिलक संख्या-कोणे ४, कर्णनन्दी पर ८, प्ररथनन्दी पर ८ कुल २० तिलक।