प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ प्रासादमण्डने ४-अमृतोद्भवप्रासाद — तद्रूपे तत्प्रमाणे च रथे कर्णे तिलकं न्यसेत् । अमृतोद्भवनामोऽयं सर्वदेवेभ्यः कारयेत् ॥२१॥ इत्यमृतोद्भवप्रासादः ॥४॥ तल और स्वरूप रत्नकोटि प्रासाद के अनुसार जानें । विशेष यह है कि-कोण और प्रतिरथ के ऊपर एक एक तिलक भी चढ़ावें । जिससे अमृतोद्भव नाम का प्रासाद होता है । यह सब देवों के लिये बनावे । ॥२१॥ शृंगसंख्या-पूर्ववत् २०६ । तिलक संख्या-कोणे ४ प्रतिकर्णों ८ कुल १२ । विभक्ति चौथी । ५-अभिनन्दनजिनवल्लभ—क्षितिभूषणप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे षोडशपदभाजिते । कर्णभागद्वयं कार्यं प्रतिकर्णास्तथैव च ॥२२॥ उपरथो द्विभागश्च भद्रार्धं द्वयमेव च । कर्णे च क्रमचत्वारि प्रतिकर्णे क्रमत्रयम् ॥२३॥ उपरथे क्रमद्वौ च ऊर्ध्वे तिलकशोभितम् । द्वादश उरुशृङ्गाणि प्रत्यङ्गानि च षोडश ॥२४॥ क्षितिभूषणनामोऽयं प्रासादश्चाभिनन्दनः । इत्यभिनन्दनजिनवल्लभः क्षितिभूषणप्रासादः ॥५॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका सोलह भाग करें । उनमें से दो भाग का कोण, दो भाग का प्रतिरथ, दो भाग का उपरथ और दो भाग का भद्रार्ध बनावें । कोणे के ऊपर चार क्रम, प्रतिरथ के ऊपर तीन क्रम, उपरथ के ऊपर दो क्रम और एक तिलक चढ़ावे । चारों तरफ के भद्र के ऊपर बारह उरुशृंग और सोलह प्रत्यंग चढ़ावे । ऐसा अभिन दन जिन वल्लभ क्षितिभूषण नाम का प्रासाद है ॥२२ से २४॥ शृंगसंख्या-कोणे १७६, प्रतिरथे २१६, उपरथे ११२, भद्रे १२, प्रत्यंग १६ एक शिखर, कुल ५३३ शृंग । तिलक ८ उपरथे ।