प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ जिनेन्द्रप्रासादाध्याय- १८७ आठ उरुशृंग और आठ प्रत्यंग कोने पर चढावे । कोणे के ऊपर केसरी, सर्वतोभद्र और नंदन ये तीन क्रम चढ़ावे । ऐसा अजितजिनको वल्लभ कामदायक नाम का प्रासाद है ॥१३ से १६ ॥ शृंगसंख्या—कोणे १०८, प्रतिकर्णों ११२, भद्रे ८, प्रत्यंग ८ और एक शिखर, कुल २३७ शृंग । तीसरी विभक्ति । ३-संभवजिनवल्लभ—रत्नकोटिप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे नवभागविभाजिते । भद्रार्धं सार्धभागेन चैकभागः प्रतिरथः ॥१७॥ कर्णिका नन्दिका पादा सार्धकर्णो विचक्षण ! । कर्णे क्रमद्वयं कार्यं प्रतिकर्णे तथैव च ॥१८॥ 'केसरीसर्वतोभद्र-क्रमद्वयं व्यवस्थितम् । कर्णिकानन्दिकयोश्च २शृङ्गमेकैकं कारयेत् ॥१९॥ षोडश उरुशृङ्गाणि चाष्टौ प्रत्यङ्गानि च । रत्नकोटिश्च नामार्यं प्रासादः संभवे जिने ॥२०॥ इति संभवजिनवल्लभो रत्नकोटिप्रासादः ॥३॥ प्रासाद को समचोरस भूमिका नव भाग करें । उनमें से डेढ़ भाग का भद्रार्ध, एक भाग का प्रतिरथ, कर्णी और नन्दिका पाव पाव भाग की और कोण डेढ़ भाग का रक्खे । कोणे के ऊपर और प्रतिकर्ण के ऊपर दो दो क्रम केसरी और सर्वतोभद्र चढावे । कर्णी और नन्दिका के ऊपर एक एक शृंग चढावे । चारो दिशा के भद्र के ऊपर सोलह उरुशृंग और आठ प्रत्यंग कोने पर चढ़ावे । ऐसा संभवजिन को वल्लभ रत्नकोटि नाम का प्रासाद है । ॥१७ से २०॥ शृंगसंख्या—कोणे ५६, प्रतिकर्णों ११२, कर्णीपर ८, नंदीपर ८, उरुशृंग १६, प्रत्यंग ८, और एक शिखर, कुल २०६ शृंग । १. 'प्रथमक्रमकेसरी च द्वितोयं च श्रीवत्सकम्' २. शृङ्गद्वयं च'