भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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१८६ प्रासादमण्डने कोणो के ऊपर चार १क्रम, प्रतिकर्ण के ऊपर तीन क्रम, उपरथ और नन्दिग्रों के 'ऊपर दो २ क्रम चढ़ावें चारों दिशा के भद्र के ऊपर कुल बीस उरुशृंग चढ़ावें । तथा सोलह प्रत्यंग कोने पर चढ़ावें । कोणा के ऊपर नीचे से पहला क्रम नन्दिश, दूसरा नन्दशालिक, तीसरा नंदन और चौथा केसरी क्रम चढ़ावें और उसके ऊपर एक शोभायमान तिलक चढ़ावें । ऐसा ऋषभजिन को वल्लभ कमलभूषण नामका प्रासाद है ॥११० से १२॥ शृंगसंख्या—कोणे २२४, प्रतिकर्णे २८०, उपरथे १४४, नन्दिग्रों के ऊपर ४३२, भद्रे २०, प्रत्यंग १६, एक शिखर, कुल १११७ शृंग और चार तिलक कोणे के ऊपर । विभक्ति दूसरी । २-अजितजिनवल्लभ-कामदायकप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे द्वादशपदभाजिते । कर्णभागद्वयं कार्यं प्रतिकर्णस्तथैव च ॥१३॥ २भद्रार्धं च द्विभागेन चतुर्दिक्षु व्यवस्थितम् । कर्णे क्रमत्रयं कार्यं प्रतिकर्णे क्रमद्वयम् ॥१४॥ अष्टौ चैवोरुशृङ्गाणि ह्यष्टौ प्रत्यङ्गानि च । कर्णे च केसरीं दद्यात् सर्वतोभद्रमेव च ॥१५॥ नन्दनमजिते देयं चतुष्कोणेषु शोभितम् । कामदायकप्रासादो ह्यजितजिनवल्लभः ॥१६॥ इति अजितजिनवल्लभः कामदायकप्रासादः ॥२॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बारह भाग करें, उनमें से दो भागका कोण, दो भाग का प्रतिकर्ण और दो भाग का भद्रार्ध रखें । कोणो के ऊपर तीन क्रम, प्रतिकर्ण के ऊपर दो क्रम, १. इस प्रकरण में किसी श्लोक मे 'कर्म' और किसी श्लोक में 'क्रम' ऐसे दो प्रकार के शब्दों का प्रयोग प्राचीन प्रतियो मे देखने मे आता है। मैंने प्रायः कर्म के स्थान पर क्रम शब्द का प्रयोग ठीक समझकर किया है। बाकी दोनो शब्द ठीक हैं। क्रम कहने से शृंगो का अनुक्रम और कर्म (काम) कहने से शृंगो का समूह अर्थ होता है। काम का समूह अर्थ सोने चांदी के वरग बनाने बालों में प्रचलित है। ये लोग १६० वरग के समूह को एक काम बोलते हैं। २. 'भद्रार्धं सार्धभागेन नन्दी तु सार्धभागिका।' पाठान्तरे ।