भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १८५ तलनिर्माण— प्रासाददीर्घतो व्यासो भित्तिबाह्ये सुरालये । षोडशांशैर्हरेद् भागं शेषं च द्विगुणं भवेत् ॥५॥ प्रथमे नवमे चैव द्वितीये चतुरो भवेत् । अयं विधिः प्रकर्त्तव्यो भागं च द्वित्र्यंशं भवेत् ॥६॥ तत्र युक्तिः प्रकर्त्तव्यो प्रासादे सर्वनामतः । शिवमुखे मया श्रुतं भाषितं विश्वकर्मणा ॥७॥ मण्डोवर के बाहर के भाग तक प्रासाद की लम्बाई और चौड़ाई का गुणाकार करके उसको सोलह से भाग दे, जो शेष रहे उसको दुगुणा करना...............। प्रथमा विभक्ति । १-कमलभूषण (ऋषभजिनवल्लभ) प्रासाद— चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे द्वात्रिंशत्पदभाजिते । कर्णभागत्रयं कार्यं प्रतिकर्णस्तथैव च ॥८॥ उपरथस्त्रिभागश्च भद्रार्थं वेदभागिकम् । नन्दिका कर्णिका चैव चैकभागा व्यवस्थिता ॥६॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बत्तीस भाग करे, उनमे से तीन भाग का कोण, तीन भाग का प्रतिरथ, तीन भाग का उपरथ और चार भाग का भद्रार्थ रक्खे। कोणिका और नन्दिका एक २ भाग की रक्खे ॥८-६॥ कर्णे च क्रमचत्वारि प्रतिकर्णे क्रमत्रयम् । उपरथे द्वयं ज्ञेयं कर्णिकायां क्रमद्वयम् ॥१०॥ विंशतिरुहशृङ्गाणि प्रत्यङ्गानि च षोडश । कर्णे च केसरी दद्यान्नन्दनं नन्दशालिकम् ॥११॥ प्रथमक्रमो नन्दीश ऊर्ध्वे तिलकशोभनम् । कमलभूषणनामोऽयं ऋषभजिनवल्लभः ॥१२॥ इति ऋषभजिनवल्लभ कमलभूषणप्रासाद. ॥१॥ प्रा० २४