प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १८५ तलनिर्माण— प्रासाददीर्घतो व्यासो भित्तिबाह्ये सुरालये । षोडशांशैर्हरेद् भागं शेषं च द्विगुणं भवेत् ॥५॥ प्रथमे नवमे चैव द्वितीये चतुरो भवेत् । अयं विधिः प्रकर्त्तव्यो भागं च द्वित्र्यंशं भवेत् ॥६॥ तत्र युक्तिः प्रकर्त्तव्यो प्रासादे सर्वनामतः । शिवमुखे मया श्रुतं भाषितं विश्वकर्मणा ॥७॥ मण्डोवर के बाहर के भाग तक प्रासाद की लम्बाई और चौड़ाई का गुणाकार करके उसको सोलह से भाग दे, जो शेष रहे उसको दुगुणा करना...............। प्रथमा विभक्ति । १-कमलभूषण (ऋषभजिनवल्लभ) प्रासाद— चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे द्वात्रिंशत्पदभाजिते । कर्णभागत्रयं कार्यं प्रतिकर्णस्तथैव च ॥८॥ उपरथस्त्रिभागश्च भद्रार्थं वेदभागिकम् । नन्दिका कर्णिका चैव चैकभागा व्यवस्थिता ॥६॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बत्तीस भाग करे, उनमे से तीन भाग का कोण, तीन भाग का प्रतिरथ, तीन भाग का उपरथ और चार भाग का भद्रार्थ रक्खे। कोणिका और नन्दिका एक २ भाग की रक्खे ॥८-६॥ कर्णे च क्रमचत्वारि प्रतिकर्णे क्रमत्रयम् । उपरथे द्वयं ज्ञेयं कर्णिकायां क्रमद्वयम् ॥१०॥ विंशतिरुहशृङ्गाणि प्रत्यङ्गानि च षोडश । कर्णे च केसरी दद्यान्नन्दनं नन्दशालिकम् ॥११॥ प्रथमक्रमो नन्दीश ऊर्ध्वे तिलकशोभनम् । कमलभूषणनामोऽयं ऋषभजिनवल्लभः ॥१२॥ इति ऋषभजिनवल्लभ कमलभूषणप्रासाद. ॥१॥ प्रा० २४
१८६ प्रासादमण्डने कोणो के ऊपर चार १क्रम, प्रतिकर्ण के ऊपर तीन क्रम, उपरथ और नन्दिग्रों के 'ऊपर दो २ क्रम चढ़ावें चारों दिशा के भद्र के ऊपर कुल बीस उरुशृंग चढ़ावें । तथा सोलह प्रत्यंग कोने पर चढ़ावें । कोणा के ऊपर नीचे से पहला क्रम नन्दिश, दूसरा नन्दशालिक, तीसरा नंदन और चौथा केसरी क्रम चढ़ावें और उसके ऊपर एक शोभायमान तिलक चढ़ावें । ऐसा ऋषभजिन को वल्लभ कमलभूषण नामका प्रासाद है ॥११० से १२॥ शृंगसंख्या—कोणे २२४, प्रतिकर्णे २८०, उपरथे १४४, नन्दिग्रों के ऊपर ४३२, भद्रे २०, प्रत्यंग १६, एक शिखर, कुल १११७ शृंग और चार तिलक कोणे के ऊपर । विभक्ति दूसरी । २-अजितजिनवल्लभ-कामदायकप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे द्वादशपदभाजिते । कर्णभागद्वयं कार्यं प्रतिकर्णस्तथैव च ॥१३॥ २भद्रार्धं च द्विभागेन चतुर्दिक्षु व्यवस्थितम् । कर्णे क्रमत्रयं कार्यं प्रतिकर्णे क्रमद्वयम् ॥१४॥ अष्टौ चैवोरुशृङ्गाणि ह्यष्टौ प्रत्यङ्गानि च । कर्णे च केसरीं दद्यात् सर्वतोभद्रमेव च ॥१५॥ नन्दनमजिते देयं चतुष्कोणेषु शोभितम् । कामदायकप्रासादो ह्यजितजिनवल्लभः ॥१६॥ इति अजितजिनवल्लभः कामदायकप्रासादः ॥२॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बारह भाग करें, उनमें से दो भागका कोण, दो भाग का प्रतिकर्ण और दो भाग का भद्रार्ध रखें । कोणो के ऊपर तीन क्रम, प्रतिकर्ण के ऊपर दो क्रम, १. इस प्रकरण में किसी श्लोक मे 'कर्म' और किसी श्लोक में 'क्रम' ऐसे दो प्रकार के शब्दों का प्रयोग प्राचीन प्रतियो मे देखने मे आता है। मैंने प्रायः कर्म के स्थान पर क्रम शब्द का प्रयोग ठीक समझकर किया है। बाकी दोनो शब्द ठीक हैं। क्रम कहने से शृंगो का अनुक्रम और कर्म (काम) कहने से शृंगो का समूह अर्थ होता है। काम का समूह अर्थ सोने चांदी के वरग बनाने बालों में प्रचलित है। ये लोग १६० वरग के समूह को एक काम बोलते हैं। २. 'भद्रार्धं सार्धभागेन नन्दी तु सार्धभागिका।' पाठान्तरे ।
अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्याय- १८७ आठ उरुशृंग और आठ प्रत्यंग कोने पर चढावे । कोणे के ऊपर केसरी, सर्वतोभद्र और नंदन ये तीन क्रम चढ़ावे । ऐसा अजितजिनको वल्लभ कामदायक नाम का प्रासाद है ॥१३ से १६ ॥ शृंगसंख्या—कोणे १०८, प्रतिकर्णों ११२, भद्रे ८, प्रत्यंग ८ और एक शिखर, कुल २३७ शृंग । तीसरी विभक्ति । ३-संभवजिनवल्लभ—रत्नकोटिप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे नवभागविभाजिते । भद्रार्धं सार्धभागेन चैकभागः प्रतिरथः ॥१७॥ कर्णिका नन्दिका पादा सार्धकर्णो विचक्षण ! । कर्णे क्रमद्वयं कार्यं प्रतिकर्णे तथैव च ॥१८॥ 'केसरीसर्वतोभद्र-क्रमद्वयं व्यवस्थितम् । कर्णिकानन्दिकयोश्च २शृङ्गमेकैकं कारयेत् ॥१९॥ षोडश उरुशृङ्गाणि चाष्टौ प्रत्यङ्गानि च । रत्नकोटिश्च नामार्यं प्रासादः संभवे जिने ॥२०॥ इति संभवजिनवल्लभो रत्नकोटिप्रासादः ॥३॥ प्रासाद को समचोरस भूमिका नव भाग करें । उनमें से डेढ़ भाग का भद्रार्ध, एक भाग का प्रतिरथ, कर्णी और नन्दिका पाव पाव भाग की और कोण डेढ़ भाग का रक्खे । कोणे के ऊपर और प्रतिकर्ण के ऊपर दो दो क्रम केसरी और सर्वतोभद्र चढावे । कर्णी और नन्दिका के ऊपर एक एक शृंग चढावे । चारो दिशा के भद्र के ऊपर सोलह उरुशृंग और आठ प्रत्यंग कोने पर चढ़ावे । ऐसा संभवजिन को वल्लभ रत्नकोटि नाम का प्रासाद है । ॥१७ से २०॥ शृंगसंख्या—कोणे ५६, प्रतिकर्णों ११२, कर्णीपर ८, नंदीपर ८, उरुशृंग १६, प्रत्यंग ८, और एक शिखर, कुल २०६ शृंग । १. 'प्रथमक्रमकेसरी च द्वितोयं च श्रीवत्सकम्' २. शृङ्गद्वयं च'
१८८ प्रासादमण्डने ४-अमृतोद्भवप्रासाद — तद्रूपे तत्प्रमाणे च रथे कर्णे तिलकं न्यसेत् । अमृतोद्भवनामोऽयं सर्वदेवेभ्यः कारयेत् ॥२१॥ इत्यमृतोद्भवप्रासादः ॥४॥ तल और स्वरूप रत्नकोटि प्रासाद के अनुसार जानें । विशेष यह है कि-कोण और प्रतिरथ के ऊपर एक एक तिलक भी चढ़ावें । जिससे अमृतोद्भव नाम का प्रासाद होता है । यह सब देवों के लिये बनावे । ॥२१॥ शृंगसंख्या-पूर्ववत् २०६ । तिलक संख्या-कोणे ४ प्रतिकर्णों ८ कुल १२ । विभक्ति चौथी । ५-अभिनन्दनजिनवल्लभ—क्षितिभूषणप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे षोडशपदभाजिते । कर्णभागद्वयं कार्यं प्रतिकर्णास्तथैव च ॥२२॥ उपरथो द्विभागश्च भद्रार्धं द्वयमेव च । कर्णे च क्रमचत्वारि प्रतिकर्णे क्रमत्रयम् ॥२३॥ उपरथे क्रमद्वौ च ऊर्ध्वे तिलकशोभितम् । द्वादश उरुशृङ्गाणि प्रत्यङ्गानि च षोडश ॥२४॥ क्षितिभूषणनामोऽयं प्रासादश्चाभिनन्दनः । इत्यभिनन्दनजिनवल्लभः क्षितिभूषणप्रासादः ॥५॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका सोलह भाग करें । उनमें से दो भाग का कोण, दो भाग का प्रतिरथ, दो भाग का उपरथ और दो भाग का भद्रार्ध बनावें । कोणे के ऊपर चार क्रम, प्रतिरथ के ऊपर तीन क्रम, उपरथ के ऊपर दो क्रम और एक तिलक चढ़ावे । चारों तरफ के भद्र के ऊपर बारह उरुशृंग और सोलह प्रत्यंग चढ़ावे । ऐसा अभिन दन जिन वल्लभ क्षितिभूषण नाम का प्रासाद है ॥२२ से २४॥ शृंगसंख्या-कोणे १७६, प्रतिरथे २१६, उपरथे ११२, भद्रे १२, प्रत्यंग १६ एक शिखर, कुल ५३३ शृंग । तिलक ८ उपरथे ।
अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १०६ विभक्ति पांचवीं । ६-सुमतिजिनवल्लभ प्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्दशविभाजिते ॥२५॥ कर्णो द्विभागिको ज्ञेयः प्रतिकर्णस्तथैव च । निर्गमस्तत्समो ज्ञेयो नन्दिका भागविश्रुता ॥२६॥ भद्रार्थं च द्विभागेन कर्त्तव्यं च चतुर्दिशि । कर्णे क्रमद्वयं कार्यं प्रतिकर्णे तथैव च ॥२७॥ भद्रे चैवोरुचत्वारि तथाष्टौ प्रत्यङ्गानि च । नन्दिकायां शृङ्गकूटं सुमतिजिननामतः ॥२८॥ इति सुमतिजिनवल्लभप्रासादः ॥६॥ समचोरस भूमिका चौदह भाग करे, उनमे से दो भाग का कोना, दो भाग का प्रतिरथ, एक भाग की नन्दी और दो भाग का भद्रार्ध बनावे । कोना और प्रतिरथ का निर्गम समदल रक्खे । कोने के ऊपर दो क्रम, प्रतिरथ के ऊपर दो क्रम, प्रत्येक भद्र के ऊपर चार उरुशृंग, आठ प्रत्यंगशृंग और नन्दी के ऊपर एक श्रीवत्सशृंग तथा एक कूट चढावे । यह सुमतिजिन नाम का प्रासाद है ॥२५ से २८॥ शृंग सख्या-कोने ५६, प्रतिरथे ११२, भद्रे १६, प्रत्यग, ८, नंदी के ऊपर ८, एक शिखर कुल २०१ शृंग । चार कूट नंदी पर । विभक्ति छठी । ७-पद्मप्रभजिन प्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे विंशधा प्रतिभाजिते । कर्णो भागद्वयं कार्यः प्रतिकर्णस्तथैव च ॥२९॥ कर्णिका नन्दिका भागा भद्रार्थं चतुर्भागकम् । कर्णे क्रमद्वयं कार्यं प्रतिकर्णे तथैव च ॥३०॥ केसरीं सर्वतोभद्रं क्रमद्वयं व्यवस्थितम् । कर्णिकायां शृङ्गकूटं नन्दिकायां तथैव च ॥३१॥ भद्रे चैवोरुचत्वारि ह्यष्टौ प्रत्यङ्गानि च । पद्मवल्लभनामोऽयं जिनेन्द्रे पद्मनायके ॥३२॥ इति पद्मप्रभजिनप्रासादः ॥७॥
१६० प्रासादमण्डने प्रासाद की समचोरस भूमि का बीस भाग करें। उनमें से दो भाग का कोना, दो भाग का प्रतिरथ, कर्णिका एक भाग, नंदी एक भाग और भद्रार्ध चार भाग का रखें। कोना और प्रतिरथ के ऊपर केसरी और सर्वतोभद्र ये दो क्रम चढ़ावें। कर्णिका और नंदी के ऊपर एक एक श्रृंग और एक एक कूट चढ़ावें, यह पद्मप्रभजिनदेव को वल्लभ ऐसा पद्मवल्लभ नाम का प्रासाद है ॥३६ से ३२॥ श्रृंगसंख्या—कोने ५६, प्रतिरथे ११२, कर्णिका पर ८, नंदी पर ८, भद्रे १६ और प्रत्यंग ८ एक शिखर कुल २०६ श्रृंग और आठ कूट—चार कर्णिका और चार नंदी पर । ८-पद्मरागप्रासाद— पद्मवल्लभसंस्थाने कर्त्तव्यः पद्मरागकः । रथोर्ध्वं तिलकं दद्यात् स्वरूपो लक्षणान्वितः ॥३३॥ इति पद्मरागप्रासादः ॥८॥ इस प्रासाद का मान और स्वरूप ऊपर के पद्मवल्लभ प्रासाद के अनुसार जानें । विशेष यह है कि-प्ररथ के ऊपर एक एक तिलक भी चढावें, जिसे पद्मराग नाम का प्रासाद होता है ॥३३॥ ६-पुष्टिवर्द्धनप्रासाद— तद्रूपे च प्रकर्त्तव्यः कर्णोर्ध्वं तिलकं न्यसेत् । पुष्टिवर्द्धननामोऽयं तुष्टिं पुष्टिं विवर्धयेत् ॥३४॥ इति पुष्टिवर्द्धन प्रासादः ॥६॥ इस प्रासाद का मान और स्वरूप पद्मराग प्रासाद के अनुसार जानें । विशेष यह है कि कोणे के ऊपर एक एक तिलक भी चढाने से तुष्टि पुष्टि को बढाने वाला पुष्टिवर्द्धन नाम का प्रासाद होता है ॥३४॥ विभक्ति सातवीं । १०-सुपार्श्वजिनवल्लभप्रासाद— दशभागीकृते क्षेत्रे कर्णोऽस्य च द्विभागिकः । प्रतिकर्णः सार्धभागो निर्गमे तत्समं भवेत् ॥३५॥ भद्रार्धं च सार्धभागं कपिले भद्रमानयोः । निर्गमं पदमानेन चतुर्दिक्षु च योजयेत् ॥३६॥
अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६१ कर्णौ क्रमद्वयं कार्यं रथे भद्रे तथोद्गमः । सुपार्श्वनामो विज्ञेयः गृहराजः सुखावहः ॥३७॥ इति सुपार्श्वजिनवल्लभप्रासादः ॥१०॥ प्रासाद की समचोरस भूमि का दस भाग करे । उन मे से दो भाग का कोण, डेढ भाग का प्रतिकर्ण बनावे । ये दोनो अंग समचोरस निकलता रक्खे । भद्रार्ध डेढ भाग का रक्खे, उसके दोनो बगल मे दो कपिला भद्र के मान की बनावें । भद्र का निकाला एक भाग का रक्खे । कोणो के ऊपर दो क्रम चढ़ावे, तथा प्रतिकर्ण और भद्र के ऊपर डोढीया (उद्गम) बनावे । ऐसा प्रासादराज सुपार्श्वनाम का है, यह सुख देने वाला है ॥ ३५ से ३७ ॥ शृंगसख्या—कोणे ५६, एक शिखर कुल ५७ शृंग । ११—श्रीवल्लभप्रासाद— रथोर्ध्वं शृङ्गमेकं तु भद्रे चैवं चतुर्दिशि । श्रीवल्लभस्तदा नाम प्रासादो जिनवल्लभः ॥३८॥ इति श्रीवल्लभप्रासादः ॥११॥ सुपार्श्वजिन वल्लभ प्रासाद के प्रतिकर्ण के ऊपर एक एक शृंग और भद्र के ऊपर एक एक उरुशृंग चढ़ाने से श्री वल्लभनाम का प्रासाद होता है, यह जिन देव को प्रिय है । ॥३८॥ शृंग संख्या—कोणे ५६, प्रतिकोणे ८, भद्रे ४, एक शिखर, कुल ६९ शृंग । विभक्ति आठवीं । १२—चन्द्रप्रभवल्लभ शीतलप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे द्वात्रिंशत्पदभाजिते । पञ्चभागो भवेत् कर्णः प्रतिकर्णस्तथैव च ॥२६॥ भद्रार्धं च चतुर्भागं नन्दिका कर्णिका पदा । समदलं च कर्त्तव्यं चतुर्दिक्षु व्यवस्थितम् ॥४०॥
१६२ प्रासादमण्डने श्रीवत्सं केसरीं चैव सर्वतोभद्रमेव च । कर्णे चैव प्रदातव्यं रथे चैवं तु तत्समम् ॥४१॥ नन्दिका कर्णिकायां च द्वे द्वे शृङ्गं च विन्यसेत् । भद्रे चैवोरुश्चत्वारि प्रत्यङ्गं जिनमेव च ॥४२॥ शीतलो नाम विज्ञेयः सुश्रियं च विवर्धकः । चन्द्रप्रभस्य प्रासादो विज्ञेयश्च सुखावहः ॥४३॥ इति चन्द्रप्रभवल्लभः शीतलप्रासादः ॥१२॥ प्रासाद की समचोरस भूमि का बत्तीस भाग करें। उन मे से पांच भाग का कोण, पांच भाग का प्रतिकर्ण, चार भाग का भद्रार्ध, कोणी और नन्दिका एक एक भाग की रक्खें। ये सब अंग समचोरस बनावें। कोण और उपरथ के ऊपर श्रीवत्स, केसरी और सर्वतोभद्र शृंग चढ़ावें। कोणी और नन्दिका के ऊपर दो दो शृं वत्सशृंग, भद्र के ऊपर चार चार उरुशृंग चढ़ावें और चोबीस प्रत्यंग चढ़ावे। ऐसा शीतल नाम का प्रासाद लक्ष्मी को बढाने वाला है और चन्द्रप्रभजिन को प्रिय है और सुख कारक है ॥३६ से ४३॥ शृंगसंख्या-कोणे ६० प्रतिकर्णे १२०, कोणीपर १६, नंदी पर १६, भद्रे १६, प्रत्यंग २४, एक शिखर, कुल २५३ शृंग। १३-श्रीचन्द्र प्रासाद-- तद्रूपे च प्रकर्त्तव्यो रथोर्ध्वे तिलकं न्यसेत् । श्रीचन्द्रो नाम विज्ञेयः सुरराजसुखावहः ॥४४॥ इति श्रीचन्द्रप्रासादः ॥१३॥ शीतलप्रासाद के प्रतिकर्ण के ऊपर एक एक तिलक भी चढ़ावें तो श्रीचंद्र नाम का प्रासाद होता है, यह इन्द्र को सुखकारक है ॥४४॥ शृंग संख्या पूर्ववत् २५३ और तिलक ८ प्रतिकर्णे । १४-हितुराजप्रासाद-- नन्दिका कर्णिकायां च ऊर्ध्वे तिलकं शोभनम् । हितुराजस्तदा नाम सुविधिजिनवल्लभः ॥४५॥ इति सुविधिजिनवल्लभः हितुराजप्रासादः ॥१४॥
अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६३ ऊपर के श्रीचन्द्रप्रासाद की कोणी और नन्दी के ऊपर एक २ तिलक चढाने से सुविधि- जिनवल्लभ ऐसा हितुराज नाम का प्रासाद होता है ॥४५॥ शृंगसंख्या पूर्ववत् २५३ । तिलक-कोणी पर ८, प्रतिकर्ण पर ८, नन्दी पर ८, कुल २४ । विभक्ति नवमी । १५-पुष्पदंतप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्विंशतिभाजिते । भद्रार्थं त्रिपदं वत्स ! रथौ कर्णश्च तत्समः ॥४६॥ निर्गमस्तत्प्रमाणेन सर्वशोभासमन्वितम् । रथे कर्णे तथा भद्रे द्वे शृङ्गे तिलकं न्यसेत् ॥४७॥ पुष्पदन्तस्तदा नाम सुविधिजिनवल्लभः । कार्यः सुविधिनाथाय धर्मार्थकाममोक्षदः ॥४८॥ इति पुष्पदंतप्रासादः ॥१५॥ प्रासाद की समचोरस भूमि का चौवीस भाग करे, इन में से कोण, प्रतिरथ, उपरथ और भद्रार्थ, ये सब तीन तीन भाग का रक्खे । और निर्गम मे ये सब समदल रक्खे । भद्र के ऊपर दो उरुशृंग चढावे । कोना, प्रतिरथ और उपरथ ये तीनो के ऊपर दो दो शृंग और एक एक तिलक चढाने से पुष्पदंत नाम का प्रासाद होता है। यह सुविधि जिन को वल्लभ है । ऐसा प्रासाद बनाने से धर्म अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥४६ से ४८॥ शृंग संख्या-कोणो ८, प्रतिकर्ण १६ उपरथे १६, भद्रे ८ एक शिखर कुल ४९ शृंग । तिलक संख्या-कोणे ४ प्रतिकर्णे ८, उपरथे ८ कुल २० तिलक । विभक्ति दसवीं । १६-शीतलजिनप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्विंशतिभाजिते । कर्णश्चैव समाख्यात-श्चतुर्भागश्च विस्तृतः ॥४९॥ प्रतिरथस्त्रयभागो भद्रार्थं भूतभागिकम् । रथे कर्णे च शृङ्गैकं तदूर्ध्वं तिलकं द्वयम् ॥५०॥ प्रा० २५
१६४ प्रासादमण्डने द्वादश उरःशृङ्गाणि प्रत्यङ्गानि ततोऽष्टभिः । शीतलश्च तदा नाम प्रासादो जिनवल्लभः ॥५१॥ इति शीतलजिनप्रासादः ॥१६॥ प्रासाद की सम चौरस भूमिका चौबीस भाग करें। उनमें से चार भाग का कोण, तीन भाग का प्रतिरथ और पाच भाग का भद्रार्ध बनावें । कोण और प्रतिकर्ण के ऊपर एक एक शृंग और दो दो तिलक, चारों भद्र के ऊपर कुल बारह उरुशृंग, तथा आठ प्रत्यंग चढ़ावे । ऐसा शीतल नाम का प्रासाद शीतल जिनको प्रिय है ॥४६ से ५१॥ शृंगसंख्या-कोणे ४, प्रतिकर्णे ८, भद्रे १२, प्रत्यंग ८, एक शिखर, कुल ३३ शृंग। तिलक-कोणे ८, प्रतिकर्णे १६, कुल २४ तिलक । १७ कीर्त्तिदायकप्रासाद- तद्रूपे तत्प्रमाणे च कर्त्तव्यः पूर्वमानतः १। कर्णोर्ध्वे च द्वयं शृङ्गे प्रासादः कीर्त्तिदायकः ॥५२॥ इति कीर्त्तिदायकप्रासादः ॥१७॥ ऊपर के शीतल जिन प्रासाद के कोणे के ऊपर का एक तिलक कम करके उसके बदले शृंग चढ़ाने से कीर्त्तिदायक नाम का प्रासाद होता है ॥५२॥ शृंगसंख्या-कोणे ८, प्रतिकर्णे ८, भद्रे १२, प्रत्यंग ८, एक शिखर, कुल ३७ शृंग । तिलक-कोणे ४, प्रतिकर्णे १६ । १८-मनोहरप्रासाद-- 'कर्णे सप्त प्रतिकर्णे पञ्च मनोहरदायकः । तन्मानं च प्रकर्तव्यः स्वरूपो लक्षणान्वितः ॥५३॥ इति मनोहरप्रासादः ॥१८॥ ऊपर के प्रासाद के अनुसार मान और स्वरूप जानें। विशेष यह है कि-कोणे के ऊपर एक केसरी क्रम और दो श्रीवत्सशृंग, तथा प्रतिकर्ण के ऊपर एक केसरी क्रम चढ़ाने से मनोहर नाम का प्रासाद होता है ॥५३॥ शृगसंख्या-कोणे २८, प्रतिकर्णे ४०, भद्रे १२, प्रत्यग ८, एक शिखर, कुल ८९ शृंग । १. 'कर्ण सप्तश प्रतिकर्णे प्रासादश्च मनोहरः ।' पाठान्तरे ।
अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६५ विभक्ति ग्यारहवीं । १६-श्रेयांसजिनवल्लभप्रासाद- ¹षोडशांशः प्रकर्त्तव्यः कर्णस्त्रयं रथस्त्रयम् । भद्रार्धं ²द्विपदं वत्स ! चतुर्दिक्षु नियोजयेत् ॥५४॥ निर्गमं पदमानेन स्वहस्ताङ्गुलमानतः । शृङ्गं च तिलकं कर्णे रथे भद्रे चैवोद्गमः ॥५५॥ श्रेयांसवल्लभो नाम प्रासादश्च मनोहरः । इति श्रेयांसजिनवल्लभप्रासादः ॥१६॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका सोलह भाग करे । उनमे तीन भाग का कोण, तीन भाग का प्रतिकर्ण और दो भाग का भद्रार्ध बनावे । इसके अंगों का निकाला प्रासाद के पद के अनुसार हस्तांगुल मान का रखें । अर्थात् जितने हाथ का प्रासाद हो, उतने अंगुल निकलता रखें । कोण और प्रतिकोण के ऊपर एक एक शृंग और एक एक तिलक चढावे । तथा भद्र के ऊपर उद्गम बनावें । ऐसा श्रे यास जिनवल्लभ नाम का सुंदर प्रासाद है ॥५४ से ५५॥ शृंगसंख्या-कोणे ४, प्रतिकोणे ८, एक शिखर, कुल १३ शृंग । तिलक संख्या-कोणे ४ प्रतिकर्णे ८ । २०-सुकुलप्रासाद- तद्रूपे तत्प्रमाणे च शृङ्गञ्चत्वारि भद्रके ॥५६॥ सुकुलो नाम विज्ञेयो प्रासादो जिनवल्लभः । इति सुकुलप्रासादः ॥२०॥ मान और प्रमाण ऊपर के प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष यह है कि-भद्र के ऊपर एक एक शृंग चढाने से सुकुल नाम का प्रासाद होता है । वह जिन देव को प्रिय है ॥५६॥ शृंग संख्या-कर्णों ४, प्रतिकर्णों ८ भद्रे ४, एक शिखर, कुल १७ । तिलक १२ । २१-कुलनंदनप्रासाद- उरःशृङ्गाष्टकं कुर्यात् प्रासादः कुलनन्दनः ॥५७॥ श्रेयासजिनवल्लभ प्रासाद के भद्र के ऊपर आठ उरुशृंग चढाने से कुलनन्दन नाम का प्रासाद होता है ॥४७॥ शृंग संख्या-कोणे ४, रथे ८, भद्रे ८, एक शिखर, कुल २१ शृंग । तिलक १२ १. 'अष्टावशांश ।' २. 'त्रिपद ।'
१६६ प्रासादमण्डने
विभक्ति बारहवीं । २२-वासुपूज्यजिनप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे द्वाविंशपदभाजिते । पदानां तु चतुर्भागाः कर्णो चैवं तु कारयेत् ॥५८॥ कोष्ठिका पदमानेन प्रतिरथस्त्रिभागकः । नन्दिका भागमानेन भद्रार्धं च द्विभागिकम् ॥५९॥ कर्णो क्रमत्रयं कार्यं प्रतिकर्णे क्रमद्वयम् । त्रिकूटं नन्दीकर्णे च ऊर्ध्वं तिलकशोभनम् ॥६०॥ भद्रे शृङ्गत्रयं कार्य-मष्टौ प्रत्यङ्गानि च । वासुपूज्यस्तदा नाम वासुपूज्यस्य वल्लभः ॥६१॥ इति वासुपूज्यजिनप्रासादः ॥२२॥ समचोरस भूमि के बाईस भाग करे ! उन में चार भाग का कोण, कर्णनंदी एक भाग, तीन भाग का प्रतिरथ, भद्रनन्दी एक भाग और दो भाग का भद्रार्ध रक्खें । कोणे के ऊपर तीन क्रम, प्रतिकर्ण के ऊपर दो क्रम, कोणी और नंदी के ऊपर त्रिकूट शृंग और उसके ऊपर तिलक, भद्र के ऊपर तीन तीन उरुशृंग और आठ प्रत्यंग चढ़ावे । ऐसा वासुपूज्य नामका प्रासाद वासुपूज्य जिन को प्रिय है ॥५८ से ६१॥ शृंग संख्या—कोणे १०८, प्रतिरथे ११२, कर्णनंदी पर ८, भद्रनंदी पर ८, भद्रे १२ प्रत्यग ८, एक शिखर कुल २५७ शृंग । तिलक-१६ दोनो नंदी के ऊपर । २३-रत्नसंजयप्रासाद— तद्रूपे च प्रकर्त्तव्यः कर्णोर्ध्वं तिलकं न्यसेत् । रत्नसंजयनामोऽयं गृहराजसुखावहः ॥६२॥ इति रत्नसञ्जयप्रासादः ॥२३॥ 'वासुपूज्यप्रासाद के कोणे के क्रम के ऊपर एक तिलक चढ़ाने से रत्नसंजय नाम का प्रासाद होता है। यह प्रासाद राजसुख कारक है ॥५२॥ शृंग संख्या पूर्ववत् २५७ और तिलक २०-कोणे ४, दोनो नन्दी पर १६। २४-धर्मदप्रासाद — तद्रूपे तत्प्रगाथे च चतुर्थगुरुशृङ्गकम् । धर्मदस्तस्य नामायं पुरे वै धर्मवर्धनः ॥६३॥ इति धर्मदप्रासादः ॥२४॥
अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६७ रत्नसंजयप्रासाद के भद्र के ऊपर चौथा एक उरुशृंग अधिक चढाने से धर्मद नामका प्रासाद होता है, वह नगर मे धर्म को बढाने वाला है ॥६३॥ शृंगसंख्या-कोणे १०८ प्रतिरथे ११२, कोणी पर ८, नंदी पर ८, भद्रे १६ प्रत्यंग ८, एक शिखर कुल २६१ शृंग । तिलक पूर्ववत् २० । विभक्ति तेरहवीं । २५-विमलवलभप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्विंशतिभाजिते । पदेन त्रयभागेन कर्णस्तत्र विधीयते ॥६४॥ तद्वज्ज्ञेयः प्रतिकर्णः कोणिका नन्दिका पदा । भद्रार्धं तु चतुर्भागं निर्गमं भागमेव च ॥६५॥ समनिर्गमं रथं ज्ञेयं कर्तव्यं चतुरो दिशि । कर्णे शृङ्गद्वयं कार्यं प्रतिकर्णे १द्वयमेव च ॥६६॥ नन्दिका कोणिकायां च शृङ्गकूटं सुशोभितम् । भद्रे चैवोरुचत्वारि चाष्टौ प्रत्यङ्गानि च ॥६७॥ विमलवलभनामोऽयं प्रासादो विमलप्रियः । इति विमलजिनवल्लभप्रासादः ॥२१॥ समचोरस भूमि का चौबीस भाग करे । उन मे तीन भाग का कोण, तीन भाग का प्रतिकर्ण, कोणिका और नदिका एक एक भाग, और चार भाग का भद्रार्ध बनावें । भद्र का निर्गम एक भाग रखें । रथ और कर्ण का निर्गम समदल रखे । कोणे के ऊपर तीन शृंग, प्रतिकर्ण के ऊपर दो शृंग, नदिका और कोणिका के ऊपर एक एक शृंग और एक एक कूट, भद्र के ऊपर चार उरुशृंग और आठ प्रत्यंग चढावे । यह विमलजिनवल्लभ नामका प्रासाद विमलजिन को प्रिय है ॥६४ से ६७॥ शृंगसंख्या-कोणे १२, प्रतिरथे १६, कोणी पर ८, नंदी पर ८, भद्रे १६, प्रत्यंग ८, एक शिखर कुल ६६ शृंग । कूट १६ । २६-मुक्तिदप्रासाद— तद्रूपे च प्रकर्त्तव्यो रथे तिलकं दापयेत् ॥६८॥ १. 'तथैव च ।'
१६८ प्रासादमण्डने कर्णिकायां च द्वे शृङ्गे प्रासादो जिनवल्लभः । मुक्तिदो नाम विज्ञेयो भुक्तिमुक्तिप्रदायकः ॥६६॥ इति मुक्तिदप्रासादः ॥२६॥ विमलजिनवल्लभ नाम के प्रतिरथ ऊपर एक एक तिलक और दोनों नंदीयों के ऊपर कूट के बदले शृंग चढावे । जिससे मुक्तिद नामका प्रासाद होता है, यह जिनदेव को प्रिय है और वैभवादि भोगसामग्री और मुक्ति को देने वाला है ॥६६॥ शृंग संख्या—कोणे १२, प्रतिरथे १६, कोणो पर १६, नंदी पर १६, भद्रे १६, प्रत्यंग ८, एक शिखर, कुल ८५, शृंग और तिलक ८ प्रतिरथ पर । विभक्ति चौदहवीं । २७-अनन्तजिनप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे विंशतिपदभाजिते । त्रीणि त्रीणि ततस्त्रीणि नन्दी पदेति भद्रके ॥७०॥ निर्गमं पदमानेन त्रिषु स्थानेषु भद्रके । कर्णे क्रमत्रयं कार्यं रथोर्ध्वे तत्समं भवेत् ॥७१॥ भद्रे चैवोरुचत्वारि नन्दिकायां क्रमद्वयम् । अनन्तजिनप्रासादो धनपुण्यश्रियं लभेत् ॥७२॥ इत्यनन्तजिनप्रासादः ॥२७॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बीस भाग करें । उनमे तीन भाग का कोना, तीन भाग का उपरथ, तीन भाग का भद्रार्ध और भद्रनन्दी एक भाग जानें । इन अंगों का निकाला एक भाग का रक्खे । कोण और रथ ऊपर तीन तीन क्रम, भद्र के ऊपर चार उरुशृंग और भद्र नन्दी के ऊपर दो क्रम चढ़ावे । ऐसा अनन्तजिनप्रासाद धन, पुण्य और लक्ष्मी को देने वाला है ॥७० से ७२॥ शृंग संख्या--कोणे १०८, प्ररथे २१६, नंदी पर ११२, भद्रे १६, एक सिखर, कुल ४५३ शृंग । २८-सुरेन्द्रप्रासाद— अनन्तस्य सस्थाने रथोर्ध्वे तिलकं न्यसेत् । सुरेन्द्रो नाम विज्ञेयः सर्वदेवेषु वल्लभः ॥७३॥ इति सुरेन्द्रनामप्रासादः ॥२८॥
अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६६ अनन्तजिन प्रासाद के प्ररथ के ऊपर एक २ तिलक चढाने से सुरेन्द्र नाम का प्रासाद होता है, यह सर्व देवो के लिए प्रिय है ॥७३॥ शृंग संख्या—पूर्ववत् ४५३ और तिलक ८ प्ररथे । विभक्ति पन्द्रहवीं । २९—धर्मनाथजिनप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चाष्टाविंशतिभाजिते । कर्णं रथं च भद्रार्धं युगभागं विधीयते ॥७४॥ निर्गमं तत्प्रमाणेण द्विभागा नन्दीकोशिका । केसरी सर्वतोभद्रं रथे कर्णै च दापयेत् ॥७५॥ तदूर्ध्वं तिलकं देयं सर्वशोभान्वितं कृतम् । नन्दिका कर्णिकायां च शृङ्गोर्ध्वं शृङ्गमुत्तमम् ॥७६॥ भद्रे चैवोरुचत्वारि चाष्टौ प्रत्यङ्गानि च । धर्मदो नाम विख्यातः पूरे धर्मविवर्धनः ॥७७॥ इति धर्मनाथजिनप्रासादः ॥२९॥ प्रासाद को समचोरस भूमि का अट्ठावीस भाग करे । उनमे चार भाग का कोण, चार भाग का प्ररथ, चार भाग का भद्रार्ध, एक भाग की कोणी, और एक भाग की भद्रनंदी बनावें । ये सब अंग समदल रक्खें । कोण और प्ररथ के ऊपर केसरी और सर्वतोभद्र ये दो क्रम चढावे और उसके ऊपर शोभायमान एक एक तिलक चढावे । कोणी और नन्दी के ऊपर दो दो शृंग चढावे । भद्र के ऊपर चार उरुशृंग और आठ प्रत्यंग चढावे । ऐसा धर्म को देने वाला धर्मद नाम का प्रासाद नगर मे धर्म को बढाने वाला है ॥७४ से ७७॥ शृंग संख्या—कोणे ५६, प्ररथे ११२, कोणी पर १६, नंदी पर १६, भद्रे १६, प्रत्यंग, ८ एक शिखर, कुल २२५ शृंग और तिलक ४ कोणे और ८ प्ररथे कुल १२ । ३०—धर्मवृक्षप्रासाद— तद्रूपे तत्प्रमाणे च कर्त्तव्यः सर्वकामदः । रथोर्ध्वं च कृते शृङ्गे धर्मवृक्षोऽयं नामतः ॥७८॥ इति धर्मवृक्षप्रासादः ॥३०॥
२०० प्रासादमण्डने धर्मनाथ प्रासाद के प्ररथ के ऊपर तिलक के बदले में एक एक शृंग चढ़ाने से धर्मवृक्ष नाम का प्रासाद होता है ॥६८॥ शृंग संख्या—कोणे ५६.प्ररथे १२०, कोणी पर १६, नंदी पर १६, भद्रे १६, प्रत्यंग ८, एक शिखर, कुल २३३ और तिलक ४ कोणे । विभक्ति सोलहवीं । ३१-शान्तिजिन अथवा श्रीलिंग प्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे द्वादशांशविभाजिते । कर्णे भागद्वयं कार्यः प्रतिकर्णस्तथैव च ॥७९॥ भद्रार्धे सार्धभागेन नन्दिका चार्धभागिका । कर्णे क्रमद्वयं कार्यं प्रतिकर्णे तथैव च ॥८०॥ नन्दिकायां शृङ्गकूट-मुरुशृङ्गाणि द्वादश । शान्तिनामश्च विज्ञेयः सर्वदेवेभ्यः कारयेत् ॥८१॥ श्रीलिङ्गं च तदा नाम श्रीपतिषु सुखावहः । इति शान्तिवल्लभः श्रीलिङ्गप्रासादः ॥३१॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बारह भाग करें । उनमें दो भाग का कोण, दो भाग का प्रतिकर्ण, डेढ भाग का भद्रार्ध और आधे भाग की भद्रनंदी करें । कोण और प्रतिकर्ण के ऊपर दो दो क्रम, भद्रनंदी के ऊपर एक शृंग और एक कूट, चारों भद्रों के ऊपर बारह उरु- शृंग चढावें । ऐसा शांति नामका प्रासाद जानें, यह सब देवों के लिये बनावें । इसका दूसरा नाम श्रीलिङ्ग प्रासाद है, वह विष्णु के लिये सुखदायक है ॥७९ से ८१॥ शृंगसंख्या—कोणे ५६, प्ररथे ११२ भद्रनंदी पर ८, भद्रे १२, एक शिखर, कुल १८९ शृंग और ८ कूट नंदो पर । ३२-कामदायक प्रासाद— उरुशृङ्गं पुनर्द्यात् प्रासादः कामदायकः ॥८२॥ इति कामदायकः ॥३२॥ शांतिनाथ प्रासाद के भद्र के ऊपर एक उरुशृंग अधिक चढ़ाने से कामदायक प्रासाद होता है ॥८२॥ शृंग संख्या—भद्रे १६ बाकी पूर्ववत कुल—१९३ शृंग ।
अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्याय' २०१ विभक्ति सत्रहवीं । ३३-कुंथुजिनवल्लभ कुमुदप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चाष्टभागविभाजिते । कर्णः स्यादेकभागश्च प्रतिकर्णस्तथैव च ॥८३॥ नन्दिका चैव भागार्धा त्रिपदं भद्रविस्तरम् । निर्गमं पदमानेन स्थापयेच्च चतुर्दिशि ॥८४॥ कर्णे च केसरीं दद्यात् तदूर्ध्वे तिलकं न्यसेत् । तत्सदृशं प्रतिकर्णे नन्द्यां तु तिलकं न्यसेत् ॥८५॥ भद्रे च शृंगमेकं तु कुमुदो नाम नामतः । वल्लभः सर्वदेवानां जिनेन्द्रकुंथुवल्लभः ॥८६॥ इति कुंथुनाथवल्लभः कुमुदप्रासादः ॥३३॥ प्रासाद को समचोरस भूमिका आठ भाग करे। उनमे कोण और प्रतिकर्ण एक एक भाग का, भद्रार्ध डेढ भाग और भद्रनन्दी आधा भाग बनावे। भद्र का निर्गम एक भाग रक्खे, इस प्रकार चारो दिशा मे व्यवस्था करें । कोण और प्रतिकर्ण के ऊपर एक एक केसरी शृंग और उसके ऊपर एक एक तिलक चढावे । भद्रनन्दी के ऊपर तिलक और भद्र के ऊपर एक उरुशृंग चढावें । यह कुमुदनामका प्रासाद सर्वदेवो को और कुंथुजिनदेव को वल्लभ है ॥८३ से ८६॥ शृंगसंख्या—कोणे २०, प्ररथे ४०, भद्रे ४, एक शिखर, कुल ६५ शृंग । तिलक संख्या— कोणे ४, प्ररथे ८, और नन्दी पर ८, कुल २० तिलक । ३४-शक्तिदप्रासाद— तद्रूपं च प्रकर्त्तव्यं रथे तिलकं दापयेत् । शक्तिदो नाम विज्ञेयः श्रीदेवीषु सुखावहः ॥८७॥ इति शक्तिदप्रासादः ॥३४॥ कुमुदप्रासाद के प्ररथ के ऊपर एक २ तिलक अधिक बढ़ाने से शक्तिद नाम का प्रासाद होता है । वह लक्ष्मीदेवी को सुखकारक है ॥८७॥ शृंगसंख्या—पूर्ववत् ६५ और तिलक-कोणे ४, प्ररथे १६, नन्दी पर ८ कुल २८ । प्रा० २६
२०२ प्रसादमण्डने ३५-हर्षणप्रासाद— कर्णोर्ध्वे भृङ्गं दातव्यं प्रासादो हर्षणस्तथा । इति हर्षणप्रासादः ॥३५॥ शक्तिद प्रासाद के कोणो के ऊपर एक २ शृंग अधिक चढ़ाने से हर्षण नामका प्रासाद होता है । शृंगसंख्या—कोणो २४, प्र रथे ४०, भद्रे ४, एक शिखर, कुल ६९ शृंग । तिलक पूर्ववत् २८ । ३६-भूषणप्रासाद— कर्णोर्ध्वे तिलकं दद्यात् प्रासादो भूषणस्तथा ॥८८॥ इति भूषणप्रासादः ॥३६॥ हर्षणप्रासाद के कोणो के ऊपर एक तिलक अधिक चढावे तो भूषण नामका प्रासाद होता है ॥८८॥ शृंगसंख्या—पूर्ववत् ६९ और तिलक ३२ । विभक्ति अठारहवीं । ३७-अरनाथजिनवल्लभ-कमलकन्दप्रासाद— चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे चाष्टभागविभाजिते । कर्णो द्विभागिको ज्ञेयो भद्रार्धं च द्विभागिकम् ॥८९॥ कर्णो च शृङ्गमेकं तु केसरीं च निधीयते । भद्रे चैवोद्गमः कार्यो जिनेन्द्रे चारनाथके ॥९०॥ इति त्वं विद्धि भो वत्स ! प्रासादो जिनवल्लभः । कमलकन्दनामोऽयं जिनशासनमार्गतः ॥९१॥ इति अरनाथजिनवल्लभः कमलकन्दप्रासादः ॥३७॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका आठ भाग करें। उनमें दो भाग का कोण और दो भाग का भद्रार्ध बनावें । कोणो के ऊपर एक २ केसरी शृंग चढ़ावें और भद्र के ऊपर उद्गम बनावें । ऐसा अरनाथ जिन के लिये कमलकन्द नाम का प्रासाद हे वत्स ! तूं जान ॥८९ से ९१॥ शृङ्गसंख्या—कोणो २०, एक शिखर, कुल २१ शृंग ।
अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः २०३ ३८-श्रीशैलप्रासाद— कर्णौ च तिलकं ज्ञेयं श्रीशैल ईश्वरप्रियः । इति श्रीशैलप्रासादः ॥३८॥ कमलकन्द प्रासाद के कोणे के ऊपर एक २ तिलक भी चढ़ाने से श्रीशैल नाम का प्रासाद होता है, वह ईश्वर को प्रिय है। शृंगसंख्या—पूर्ववत् २१ और तिलक ४ कोणे । ३६-अरिनाशन प्रासाद— भद्रे चैवोरुचत्वारि प्रासादस्त्वरिनाशनः ॥६२॥ इत्यरिनाशनप्रासादः ॥३६॥ श्रीशैलप्रासाद के भद्र के ऊपर एक २ उरुशृंग चढाने से अरिनाशन नामका प्रासाद होता है ॥६२॥ शृंगसंख्या—कोणे २०, भद्रे ४, एक शिखर, कुल २५ शृंग और तिलक ४ कोणे । विभक्ति उन्नीसवीं । ४०-श्रीमल्लिजिनवल्लभ-महेन्द्रप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे द्वादशपदभाजिते । कर्णो भागद्वय कार्यः प्रतिरथश्च सार्धकः ॥६३॥ सार्धभागकं भद्रार्धं चार्धं नन्दीद्वयं भवेत् । कर्णो क्रमद्वयं कार्यं प्रतिरथे तथैव च ॥६४॥ द्वादश उरुशृङ्गाणि स्थापयेच्च चतुर्दिशि । महेन्द्रनामः प्रासादो जिनेन्द्रमल्लिवल्लभः ॥६५॥ इति मल्लिजिनवल्लभो महेन्द्रप्रासाद. ॥४०॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बारह भाग करे । उनमे दो भाग का कोण, डेढ़ भागका प्रतिरथ, डेढ़ भागका भद्रार्ध, कर्णानंदी और भद्रनन्दी आधे २ भाग की करे । प्रतिरथ और कोणे के ऊपर केसेरी और सर्वतोभद्र, ये दो क्रम और भद्र के ऊपर बारह उरुशृग चढावे । ऐसा महेन्द्र नामका प्रासाद मल्लिजिनेन्द्र को वल्लभ है ॥६३ से ६५॥ शृंगसंख्या—कोणे ५६, प्ररथे ११२, भद्रे १२, एक शिखर, कुल १८१ शृंग ।
२०४ प्रासादमण्डने ४१-मानवेन्द्रप्रासाद— रथोर्ध्वे तिलकं दद्यान्मानवेन्द्रोऽथ नामतः । इति मानवेन्द्रप्रासादः ॥४१॥ महेन्द्रप्रासाद के प्रतिरथ के ऊपर एक २ तिलक भी चढ़ावें तो मानवेन्द्र नामका प्रासाद होता है। शृंगसंख्या पूर्ववत् १८१ और तिलक ८ प्ररथे । ४२-पापनाशनप्रासाद— कर्णोर्ध्वे तिलकं दद्यात् प्रासादः पापनाशनः ॥६६॥ इति पापनाशनप्रासादः ॥४२॥ मानवेन्द्रप्रासाद के कोणे के ऊपर एक २ तिलक भी चढ़ावें तो पापनाशन नामका प्रासाद होता है ॥६६॥ शृंगसंख्या पूर्ववत् १८१ । तिलक-कोणे ४, और प्ररथे ८ कुल १२ तिलक । विभक्ति बीसवीं । ४३-मानतुष्टि नामका मुनिसुव्रतप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्दशविभाजिते । बाहुद्वयं रथं कर्णं भद्रार्धं त्रयमांगिकम् ॥६७॥ श्रीवत्सं केसरीं देयं कर्णो रथे क्रमद्वयम् । द्वादशैवोरुभृङ्गाणि स्थापयेच्च चतुर्दिशि ॥६८॥ मानसतुष्टिनामोऽयं प्रासादो मुनिसुव्रतः । इति मानसतुष्टि नाम मुनिसुव्रतप्रासादः ॥४३॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका चौदह भाग करे । उनमें दो भागका कोण, दो भागका प्ररथ और तीन भागका भद्रार्ध करे । कोण और प्ररथ के ऊपर केसरी और श्रीवत्स ये दो क्रम चढ़ावे । तथा भद्र के ऊपर कुल बारह उरुशृंग चढ़ावें । ऐसा मानसतुष्टि नामका मुनिसुव्रत प्रासाद है ॥६७-६८॥ शृंगसंख्या-कोणे २४, प्ररथे ४८, भद्रे १२, एक शिखर, कुल ८५ शृंग । ४४-मनोल्याचन्द्रप्रासाद— तद्रूपे रथे तिलकं मनोल्याचन्द्रो नामतः ॥६६॥ इति मनोल्याचन्द्रप्रासादः ॥४४॥