भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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१६० प्रासादमण्डने प्रासाद की समचोरस भूमि का बीस भाग करें। उनमें से दो भाग का कोना, दो भाग का प्रतिरथ, कर्णिका एक भाग, नंदी एक भाग और भद्रार्ध चार भाग का रखें। कोना और प्रतिरथ के ऊपर केसरी और सर्वतोभद्र ये दो क्रम चढ़ावें। कर्णिका और नंदी के ऊपर एक एक श्रृंग और एक एक कूट चढ़ावें, यह पद्मप्रभजिनदेव को वल्लभ ऐसा पद्मवल्लभ नाम का प्रासाद है ॥३६ से ३२॥ श्रृंगसंख्या—कोने ५६, प्रतिरथे ११२, कर्णिका पर ८, नंदी पर ८, भद्रे १६ और प्रत्यंग ८ एक शिखर कुल २०६ श्रृंग और आठ कूट—चार कर्णिका और चार नंदी पर । ८-पद्मरागप्रासाद— पद्मवल्लभसंस्थाने कर्त्तव्यः पद्मरागकः । रथोर्ध्वं तिलकं दद्यात् स्वरूपो लक्षणान्वितः ॥३३॥ इति पद्मरागप्रासादः ॥८॥ इस प्रासाद का मान और स्वरूप ऊपर के पद्मवल्लभ प्रासाद के अनुसार जानें । विशेष यह है कि-प्ररथ के ऊपर एक एक तिलक भी चढावें, जिसे पद्मराग नाम का प्रासाद होता है ॥३३॥ ६-पुष्टिवर्द्धनप्रासाद— तद्रूपे च प्रकर्त्तव्यः कर्णोर्ध्वं तिलकं न्यसेत् । पुष्टिवर्द्धननामोऽयं तुष्टिं पुष्टिं विवर्धयेत् ॥३४॥ इति पुष्टिवर्द्धन प्रासादः ॥६॥ इस प्रासाद का मान और स्वरूप पद्मराग प्रासाद के अनुसार जानें । विशेष यह है कि कोणे के ऊपर एक एक तिलक भी चढाने से तुष्टि पुष्टि को बढाने वाला पुष्टिवर्द्धन नाम का प्रासाद होता है ॥३४॥ विभक्ति सातवीं । १०-सुपार्श्वजिनवल्लभप्रासाद— दशभागीकृते क्षेत्रे कर्णोऽस्य च द्विभागिकः । प्रतिकर्णः सार्धभागो निर्गमे तत्समं भवेत् ॥३५॥ भद्रार्धं च सार्धभागं कपिले भद्रमानयोः । निर्गमं पदमानेन चतुर्दिक्षु च योजयेत् ॥३६॥