प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६१ कर्णौ क्रमद्वयं कार्यं रथे भद्रे तथोद्गमः । सुपार्श्वनामो विज्ञेयः गृहराजः सुखावहः ॥३७॥ इति सुपार्श्वजिनवल्लभप्रासादः ॥१०॥ प्रासाद की समचोरस भूमि का दस भाग करे । उन मे से दो भाग का कोण, डेढ भाग का प्रतिकर्ण बनावे । ये दोनो अंग समचोरस निकलता रक्खे । भद्रार्ध डेढ भाग का रक्खे, उसके दोनो बगल मे दो कपिला भद्र के मान की बनावें । भद्र का निकाला एक भाग का रक्खे । कोणो के ऊपर दो क्रम चढ़ावे, तथा प्रतिकर्ण और भद्र के ऊपर डोढीया (उद्गम) बनावे । ऐसा प्रासादराज सुपार्श्वनाम का है, यह सुख देने वाला है ॥ ३५ से ३७ ॥ शृंगसख्या—कोणे ५६, एक शिखर कुल ५७ शृंग । ११—श्रीवल्लभप्रासाद— रथोर्ध्वं शृङ्गमेकं तु भद्रे चैवं चतुर्दिशि । श्रीवल्लभस्तदा नाम प्रासादो जिनवल्लभः ॥३८॥ इति श्रीवल्लभप्रासादः ॥११॥ सुपार्श्वजिन वल्लभ प्रासाद के प्रतिकर्ण के ऊपर एक एक शृंग और भद्र के ऊपर एक एक उरुशृंग चढ़ाने से श्री वल्लभनाम का प्रासाद होता है, यह जिन देव को प्रिय है । ॥३८॥ शृंग संख्या—कोणे ५६, प्रतिकोणे ८, भद्रे ४, एक शिखर, कुल ६९ शृंग । विभक्ति आठवीं । १२—चन्द्रप्रभवल्लभ शीतलप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे द्वात्रिंशत्पदभाजिते । पञ्चभागो भवेत् कर्णः प्रतिकर्णस्तथैव च ॥२६॥ भद्रार्धं च चतुर्भागं नन्दिका कर्णिका पदा । समदलं च कर्त्तव्यं चतुर्दिक्षु व्यवस्थितम् ॥४०॥