प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६३ ऊपर के श्रीचन्द्रप्रासाद की कोणी और नन्दी के ऊपर एक २ तिलक चढाने से सुविधि- जिनवल्लभ ऐसा हितुराज नाम का प्रासाद होता है ॥४५॥ शृंगसंख्या पूर्ववत् २५३ । तिलक-कोणी पर ८, प्रतिकर्ण पर ८, नन्दी पर ८, कुल २४ । विभक्ति नवमी । १५-पुष्पदंतप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्विंशतिभाजिते । भद्रार्थं त्रिपदं वत्स ! रथौ कर्णश्च तत्समः ॥४६॥ निर्गमस्तत्प्रमाणेन सर्वशोभासमन्वितम् । रथे कर्णे तथा भद्रे द्वे शृङ्गे तिलकं न्यसेत् ॥४७॥ पुष्पदन्तस्तदा नाम सुविधिजिनवल्लभः । कार्यः सुविधिनाथाय धर्मार्थकाममोक्षदः ॥४८॥ इति पुष्पदंतप्रासादः ॥१५॥ प्रासाद की समचोरस भूमि का चौवीस भाग करे, इन में से कोण, प्रतिरथ, उपरथ और भद्रार्थ, ये सब तीन तीन भाग का रक्खे । और निर्गम मे ये सब समदल रक्खे । भद्र के ऊपर दो उरुशृंग चढावे । कोना, प्रतिरथ और उपरथ ये तीनो के ऊपर दो दो शृंग और एक एक तिलक चढाने से पुष्पदंत नाम का प्रासाद होता है। यह सुविधि जिन को वल्लभ है । ऐसा प्रासाद बनाने से धर्म अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥४६ से ४८॥ शृंग संख्या-कोणो ८, प्रतिकर्ण १६ उपरथे १६, भद्रे ८ एक शिखर कुल ४९ शृंग । तिलक संख्या-कोणे ४ प्रतिकर्णे ८, उपरथे ८ कुल २० तिलक । विभक्ति दसवीं । १६-शीतलजिनप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्विंशतिभाजिते । कर्णश्चैव समाख्यात-श्चतुर्भागश्च विस्तृतः ॥४९॥ प्रतिरथस्त्रयभागो भद्रार्थं भूतभागिकम् । रथे कर्णे च शृङ्गैकं तदूर्ध्वं तिलकं द्वयम् ॥५०॥ प्रा० २५