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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६३ ऊपर के श्रीचन्द्रप्रासाद की कोणी और नन्दी के ऊपर एक २ तिलक चढाने से सुविधि- जिनवल्लभ ऐसा हितुराज नाम का प्रासाद होता है ॥४५॥ शृंगसंख्या पूर्ववत् २५३ । तिलक-कोणी पर ८, प्रतिकर्ण पर ८, नन्दी पर ८, कुल २४ । विभक्ति नवमी । १५-पुष्पदंतप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्विंशतिभाजिते । भद्रार्थं त्रिपदं वत्स ! रथौ कर्णश्च तत्समः ॥४६॥ निर्गमस्तत्प्रमाणेन सर्वशोभासमन्वितम् । रथे कर्णे तथा भद्रे द्वे शृङ्गे तिलकं न्यसेत् ॥४७॥ पुष्पदन्तस्तदा नाम सुविधिजिनवल्लभः । कार्यः सुविधिनाथाय धर्मार्थकाममोक्षदः ॥४८॥ इति पुष्पदंतप्रासादः ॥१५॥ प्रासाद की समचोरस भूमि का चौवीस भाग करे, इन में से कोण, प्रतिरथ, उपरथ और भद्रार्थ, ये सब तीन तीन भाग का रक्खे । और निर्गम मे ये सब समदल रक्खे । भद्र के ऊपर दो उरुशृंग चढावे । कोना, प्रतिरथ और उपरथ ये तीनो के ऊपर दो दो शृंग और एक एक तिलक चढाने से पुष्पदंत नाम का प्रासाद होता है। यह सुविधि जिन को वल्लभ है । ऐसा प्रासाद बनाने से धर्म अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥४६ से ४८॥ शृंग संख्या-कोणो ८, प्रतिकर्ण १६ उपरथे १६, भद्रे ८ एक शिखर कुल ४९ शृंग । तिलक संख्या-कोणे ४ प्रतिकर्णे ८, उपरथे ८ कुल २० तिलक । विभक्ति दसवीं । १६-शीतलजिनप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्विंशतिभाजिते । कर्णश्चैव समाख्यात-श्चतुर्भागश्च विस्तृतः ॥४९॥ प्रतिरथस्त्रयभागो भद्रार्थं भूतभागिकम् । रथे कर्णे च शृङ्गैकं तदूर्ध्वं तिलकं द्वयम् ॥५०॥ प्रा० २५

१६४ प्रासादमण्डने द्वादश उरःशृङ्गाणि प्रत्यङ्गानि ततोऽष्टभिः । शीतलश्च तदा नाम प्रासादो जिनवल्लभः ॥५१॥ इति शीतलजिनप्रासादः ॥१६॥ प्रासाद की सम चौरस भूमिका चौबीस भाग करें। उनमें से चार भाग का कोण, तीन भाग का प्रतिरथ और पाच भाग का भद्रार्ध बनावें । कोण और प्रतिकर्ण के ऊपर एक एक शृंग और दो दो तिलक, चारों भद्र के ऊपर कुल बारह उरुशृंग, तथा आठ प्रत्यंग चढ़ावे । ऐसा शीतल नाम का प्रासाद शीतल जिनको प्रिय है ॥४६ से ५१॥ शृंगसंख्या-कोणे ४, प्रतिकर्णे ८, भद्रे १२, प्रत्यंग ८, एक शिखर, कुल ३३ शृंग। तिलक-कोणे ८, प्रतिकर्णे १६, कुल २४ तिलक । १७ कीर्त्तिदायकप्रासाद- तद्रूपे तत्प्रमाणे च कर्त्तव्यः पूर्वमानतः १। कर्णोर्ध्वे च द्वयं शृङ्गे प्रासादः कीर्त्तिदायकः ॥५२॥ इति कीर्त्तिदायकप्रासादः ॥१७॥ ऊपर के शीतल जिन प्रासाद के कोणे के ऊपर का एक तिलक कम करके उसके बदले शृंग चढ़ाने से कीर्त्तिदायक नाम का प्रासाद होता है ॥५२॥ शृंगसंख्या-कोणे ८, प्रतिकर्णे ८, भद्रे १२, प्रत्यंग ८, एक शिखर, कुल ३७ शृंग । तिलक-कोणे ४, प्रतिकर्णे १६ । १८-मनोहरप्रासाद-- 'कर्णे सप्त प्रतिकर्णे पञ्च मनोहरदायकः । तन्मानं च प्रकर्तव्यः स्वरूपो लक्षणान्वितः ॥५३॥ इति मनोहरप्रासादः ॥१८॥ ऊपर के प्रासाद के अनुसार मान और स्वरूप जानें। विशेष यह है कि-कोणे के ऊपर एक केसरी क्रम और दो श्रीवत्सशृंग, तथा प्रतिकर्ण के ऊपर एक केसरी क्रम चढ़ाने से मनोहर नाम का प्रासाद होता है ॥५३॥ शृगसंख्या-कोणे २८, प्रतिकर्णे ४०, भद्रे १२, प्रत्यग ८, एक शिखर, कुल ८९ शृंग । १. 'कर्ण सप्तश प्रतिकर्णे प्रासादश्च मनोहरः ।' पाठान्तरे ।

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६५ विभक्ति ग्यारहवीं । १६-श्रेयांसजिनवल्लभप्रासाद- ¹षोडशांशः प्रकर्त्तव्यः कर्णस्त्रयं रथस्त्रयम् । भद्रार्धं ²द्विपदं वत्स ! चतुर्दिक्षु नियोजयेत् ॥५४॥ निर्गमं पदमानेन स्वहस्ताङ्गुलमानतः । शृङ्गं च तिलकं कर्णे रथे भद्रे चैवोद्गमः ॥५५॥ श्रेयांसवल्लभो नाम प्रासादश्च मनोहरः । इति श्रेयांसजिनवल्लभप्रासादः ॥१६॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका सोलह भाग करे । उनमे तीन भाग का कोण, तीन भाग का प्रतिकर्ण और दो भाग का भद्रार्ध बनावे । इसके अंगों का निकाला प्रासाद के पद के अनुसार हस्तांगुल मान का रखें । अर्थात् जितने हाथ का प्रासाद हो, उतने अंगुल निकलता रखें । कोण और प्रतिकोण के ऊपर एक एक शृंग और एक एक तिलक चढावे । तथा भद्र के ऊपर उद्गम बनावें । ऐसा श्रे यास जिनवल्लभ नाम का सुंदर प्रासाद है ॥५४ से ५५॥ शृंगसंख्या-कोणे ४, प्रतिकोणे ८, एक शिखर, कुल १३ शृंग । तिलक संख्या-कोणे ४ प्रतिकर्णे ८ । २०-सुकुलप्रासाद- तद्रूपे तत्प्रमाणे च शृङ्गञ्चत्वारि भद्रके ॥५६॥ सुकुलो नाम विज्ञेयो प्रासादो जिनवल्लभः । इति सुकुलप्रासादः ॥२०॥ मान और प्रमाण ऊपर के प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष यह है कि-भद्र के ऊपर एक एक शृंग चढाने से सुकुल नाम का प्रासाद होता है । वह जिन देव को प्रिय है ॥५६॥ शृंग संख्या-कर्णों ४, प्रतिकर्णों ८ भद्रे ४, एक शिखर, कुल १७ । तिलक १२ । २१-कुलनंदनप्रासाद- उरःशृङ्गाष्टकं कुर्यात् प्रासादः कुलनन्दनः ॥५७॥ श्रेयासजिनवल्लभ प्रासाद के भद्र के ऊपर आठ उरुशृंग चढाने से कुलनन्दन नाम का प्रासाद होता है ॥४७॥ शृंग संख्या-कोणे ४, रथे ८, भद्रे ८, एक शिखर, कुल २१ शृंग । तिलक १२ १. 'अष्टावशांश ।' २. 'त्रिपद ।'

१६६ प्रासादमण्डने

विभक्ति बारहवीं । २२-वासुपूज्यजिनप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे द्वाविंशपदभाजिते । पदानां तु चतुर्भागाः कर्णो चैवं तु कारयेत् ॥५८॥ कोष्ठिका पदमानेन प्रतिरथस्त्रिभागकः । नन्दिका भागमानेन भद्रार्धं च द्विभागिकम् ॥५९॥ कर्णो क्रमत्रयं कार्यं प्रतिकर्णे क्रमद्वयम् । त्रिकूटं नन्दीकर्णे च ऊर्ध्वं तिलकशोभनम् ॥६०॥ भद्रे शृङ्गत्रयं कार्य-मष्टौ प्रत्यङ्गानि च । वासुपूज्यस्तदा नाम वासुपूज्यस्य वल्लभः ॥६१॥ इति वासुपूज्यजिनप्रासादः ॥२२॥ समचोरस भूमि के बाईस भाग करे ! उन में चार भाग का कोण, कर्णनंदी एक भाग, तीन भाग का प्रतिरथ, भद्रनन्दी एक भाग और दो भाग का भद्रार्ध रक्खें । कोणे के ऊपर तीन क्रम, प्रतिकर्ण के ऊपर दो क्रम, कोणी और नंदी के ऊपर त्रिकूट शृंग और उसके ऊपर तिलक, भद्र के ऊपर तीन तीन उरुशृंग और आठ प्रत्यंग चढ़ावे । ऐसा वासुपूज्य नामका प्रासाद वासुपूज्य जिन को प्रिय है ॥५८ से ६१॥ शृंग संख्या—कोणे १०८, प्रतिरथे ११२, कर्णनंदी पर ८, भद्रनंदी पर ८, भद्रे १२ प्रत्यग ८, एक शिखर कुल २५७ शृंग । तिलक-१६ दोनो नंदी के ऊपर । २३-रत्नसंजयप्रासाद— तद्रूपे च प्रकर्त्तव्यः कर्णोर्ध्वं तिलकं न्यसेत् । रत्नसंजयनामोऽयं गृहराजसुखावहः ॥६२॥ इति रत्नसञ्जयप्रासादः ॥२३॥ 'वासुपूज्यप्रासाद के कोणे के क्रम के ऊपर एक तिलक चढ़ाने से रत्नसंजय नाम का प्रासाद होता है। यह प्रासाद राजसुख कारक है ॥५२॥ शृंग संख्या पूर्ववत् २५७ और तिलक २०-कोणे ४, दोनो नन्दी पर १६। २४-धर्मदप्रासाद — तद्रूपे तत्प्रगाथे च चतुर्थगुरुशृङ्गकम् । धर्मदस्तस्य नामायं पुरे वै धर्मवर्धनः ॥६३॥ इति धर्मदप्रासादः ॥२४॥

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६७ रत्नसंजयप्रासाद के भद्र के ऊपर चौथा एक उरुशृंग अधिक चढाने से धर्मद नामका प्रासाद होता है, वह नगर मे धर्म को बढाने वाला है ॥६३॥ शृंगसंख्या-कोणे १०८ प्रतिरथे ११२, कोणी पर ८, नंदी पर ८, भद्रे १६ प्रत्यंग ८, एक शिखर कुल २६१ शृंग । तिलक पूर्ववत् २० । विभक्ति तेरहवीं । २५-विमलवलभप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्विंशतिभाजिते । पदेन त्रयभागेन कर्णस्तत्र विधीयते ॥६४॥ तद्वज्ज्ञेयः प्रतिकर्णः कोणिका नन्दिका पदा । भद्रार्धं तु चतुर्भागं निर्गमं भागमेव च ॥६५॥ समनिर्गमं रथं ज्ञेयं कर्तव्यं चतुरो दिशि । कर्णे शृङ्गद्वयं कार्यं प्रतिकर्णे १द्वयमेव च ॥६६॥ नन्दिका कोणिकायां च शृङ्गकूटं सुशोभितम् । भद्रे चैवोरुचत्वारि चाष्टौ प्रत्यङ्गानि च ॥६७॥ विमलवलभनामोऽयं प्रासादो विमलप्रियः । इति विमलजिनवल्लभप्रासादः ॥२१॥ समचोरस भूमि का चौबीस भाग करे । उन मे तीन भाग का कोण, तीन भाग का प्रतिकर्ण, कोणिका और नदिका एक एक भाग, और चार भाग का भद्रार्ध बनावें । भद्र का निर्गम एक भाग रखें । रथ और कर्ण का निर्गम समदल रखे । कोणे के ऊपर तीन शृंग, प्रतिकर्ण के ऊपर दो शृंग, नदिका और कोणिका के ऊपर एक एक शृंग और एक एक कूट, भद्र के ऊपर चार उरुशृंग और आठ प्रत्यंग चढावे । यह विमलजिनवल्लभ नामका प्रासाद विमलजिन को प्रिय है ॥६४ से ६७॥ शृंगसंख्या-कोणे १२, प्रतिरथे १६, कोणी पर ८, नंदी पर ८, भद्रे १६, प्रत्यंग ८, एक शिखर कुल ६६ शृंग । कूट १६ । २६-मुक्तिदप्रासाद— तद्रूपे च प्रकर्त्तव्यो रथे तिलकं दापयेत् ॥६८॥ १. 'तथैव च ।'

१६८ प्रासादमण्डने कर्णिकायां च द्वे शृङ्गे प्रासादो जिनवल्लभः । मुक्तिदो नाम विज्ञेयो भुक्तिमुक्तिप्रदायकः ॥६६॥ इति मुक्तिदप्रासादः ॥२६॥ विमलजिनवल्लभ नाम के प्रतिरथ ऊपर एक एक तिलक और दोनों नंदीयों के ऊपर कूट के बदले शृंग चढावे । जिससे मुक्तिद नामका प्रासाद होता है, यह जिनदेव को प्रिय है और वैभवादि भोगसामग्री और मुक्ति को देने वाला है ॥६६॥ शृंग संख्या—कोणे १२, प्रतिरथे १६, कोणो पर १६, नंदी पर १६, भद्रे १६, प्रत्यंग ८, एक शिखर, कुल ८५, शृंग और तिलक ८ प्रतिरथ पर । विभक्ति चौदहवीं । २७-अनन्तजिनप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे विंशतिपदभाजिते । त्रीणि त्रीणि ततस्त्रीणि नन्दी पदेति भद्रके ॥७०॥ निर्गमं पदमानेन त्रिषु स्थानेषु भद्रके । कर्णे क्रमत्रयं कार्यं रथोर्ध्वे तत्समं भवेत् ॥७१॥ भद्रे चैवोरुचत्वारि नन्दिकायां क्रमद्वयम् । अनन्तजिनप्रासादो धनपुण्यश्रियं लभेत् ॥७२॥ इत्यनन्तजिनप्रासादः ॥२७॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बीस भाग करें । उनमे तीन भाग का कोना, तीन भाग का उपरथ, तीन भाग का भद्रार्ध और भद्रनन्दी एक भाग जानें । इन अंगों का निकाला एक भाग का रक्खे । कोण और रथ ऊपर तीन तीन क्रम, भद्र के ऊपर चार उरुशृंग और भद्र नन्दी के ऊपर दो क्रम चढ़ावे । ऐसा अनन्तजिनप्रासाद धन, पुण्य और लक्ष्मी को देने वाला है ॥७० से ७२॥ शृंग संख्या--कोणे १०८, प्ररथे २१६, नंदी पर ११२, भद्रे १६, एक सिखर, कुल ४५३ शृंग । २८-सुरेन्द्रप्रासाद— अनन्तस्य सस्थाने रथोर्ध्वे तिलकं न्यसेत् । सुरेन्द्रो नाम विज्ञेयः सर्वदेवेषु वल्लभः ॥७३॥ इति सुरेन्द्रनामप्रासादः ॥२८॥

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६६ अनन्तजिन प्रासाद के प्ररथ के ऊपर एक २ तिलक चढाने से सुरेन्द्र नाम का प्रासाद होता है, यह सर्व देवो के लिए प्रिय है ॥७३॥ शृंग संख्या—पूर्ववत् ४५३ और तिलक ८ प्ररथे । विभक्ति पन्द्रहवीं । २९—धर्मनाथजिनप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चाष्टाविंशतिभाजिते । कर्णं रथं च भद्रार्धं युगभागं विधीयते ॥७४॥ निर्गमं तत्प्रमाणेण द्विभागा नन्दीकोशिका । केसरी सर्वतोभद्रं रथे कर्णै च दापयेत् ॥७५॥ तदूर्ध्वं तिलकं देयं सर्वशोभान्वितं कृतम् । नन्दिका कर्णिकायां च शृङ्गोर्ध्वं शृङ्गमुत्तमम् ॥७६॥ भद्रे चैवोरुचत्वारि चाष्टौ प्रत्यङ्गानि च । धर्मदो नाम विख्यातः पूरे धर्मविवर्धनः ॥७७॥ इति धर्मनाथजिनप्रासादः ॥२९॥ प्रासाद को समचोरस भूमि का अट्ठावीस भाग करे । उनमे चार भाग का कोण, चार भाग का प्ररथ, चार भाग का भद्रार्ध, एक भाग की कोणी, और एक भाग की भद्रनंदी बनावें । ये सब अंग समदल रक्खें । कोण और प्ररथ के ऊपर केसरी और सर्वतोभद्र ये दो क्रम चढावे और उसके ऊपर शोभायमान एक एक तिलक चढावे । कोणी और नन्दी के ऊपर दो दो शृंग चढावे । भद्र के ऊपर चार उरुशृंग और आठ प्रत्यंग चढावे । ऐसा धर्म को देने वाला धर्मद नाम का प्रासाद नगर मे धर्म को बढाने वाला है ॥७४ से ७७॥ शृंग संख्या—कोणे ५६, प्ररथे ११२, कोणी पर १६, नंदी पर १६, भद्रे १६, प्रत्यंग, ८ एक शिखर, कुल २२५ शृंग और तिलक ४ कोणे और ८ प्ररथे कुल १२ । ३०—धर्मवृक्षप्रासाद— तद्रूपे तत्प्रमाणे च कर्त्तव्यः सर्वकामदः । रथोर्ध्वं च कृते शृङ्गे धर्मवृक्षोऽयं नामतः ॥७८॥ इति धर्मवृक्षप्रासादः ॥३०॥

२०० प्रासादमण्डने धर्मनाथ प्रासाद के प्ररथ के ऊपर तिलक के बदले में एक एक शृंग चढ़ाने से धर्मवृक्ष नाम का प्रासाद होता है ॥६८॥ शृंग संख्या—कोणे ५६.प्ररथे १२०, कोणी पर १६, नंदी पर १६, भद्रे १६, प्रत्यंग ८, एक शिखर, कुल २३३ और तिलक ४ कोणे । विभक्ति सोलहवीं । ३१-शान्तिजिन अथवा श्रीलिंग प्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे द्वादशांशविभाजिते । कर्णे भागद्वयं कार्यः प्रतिकर्णस्तथैव च ॥७९॥ भद्रार्धे सार्धभागेन नन्दिका चार्धभागिका । कर्णे क्रमद्वयं कार्यं प्रतिकर्णे तथैव च ॥८०॥ नन्दिकायां शृङ्गकूट-मुरुशृङ्गाणि द्वादश । शान्तिनामश्च विज्ञेयः सर्वदेवेभ्यः कारयेत् ॥८१॥ श्रीलिङ्गं च तदा नाम श्रीपतिषु सुखावहः । इति शान्तिवल्लभः श्रीलिङ्गप्रासादः ॥३१॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बारह भाग करें । उनमें दो भाग का कोण, दो भाग का प्रतिकर्ण, डेढ भाग का भद्रार्ध और आधे भाग की भद्रनंदी करें । कोण और प्रतिकर्ण के ऊपर दो दो क्रम, भद्रनंदी के ऊपर एक शृंग और एक कूट, चारों भद्रों के ऊपर बारह उरु- शृंग चढावें । ऐसा शांति नामका प्रासाद जानें, यह सब देवों के लिये बनावें । इसका दूसरा नाम श्रीलिङ्ग प्रासाद है, वह विष्णु के लिये सुखदायक है ॥७९ से ८१॥ शृंगसंख्या—कोणे ५६, प्ररथे ११२ भद्रनंदी पर ८, भद्रे १२, एक शिखर, कुल १८९ शृंग और ८ कूट नंदो पर । ३२-कामदायक प्रासाद— उरुशृङ्गं पुनर्द्यात् प्रासादः कामदायकः ॥८२॥ इति कामदायकः ॥३२॥ शांतिनाथ प्रासाद के भद्र के ऊपर एक उरुशृंग अधिक चढ़ाने से कामदायक प्रासाद होता है ॥८२॥ शृंग संख्या—भद्रे १६ बाकी पूर्ववत कुल—१९३ शृंग ।

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्याय' २०१ विभक्ति सत्रहवीं । ३३-कुंथुजिनवल्लभ कुमुदप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चाष्टभागविभाजिते । कर्णः स्यादेकभागश्च प्रतिकर्णस्तथैव च ॥८३॥ नन्दिका चैव भागार्धा त्रिपदं भद्रविस्तरम् । निर्गमं पदमानेन स्थापयेच्च चतुर्दिशि ॥८४॥ कर्णे च केसरीं दद्यात् तदूर्ध्वे तिलकं न्यसेत् । तत्सदृशं प्रतिकर्णे नन्द्यां तु तिलकं न्यसेत् ॥८५॥ भद्रे च शृंगमेकं तु कुमुदो नाम नामतः । वल्लभः सर्वदेवानां जिनेन्द्रकुंथुवल्लभः ॥८६॥ इति कुंथुनाथवल्लभः कुमुदप्रासादः ॥३३॥ प्रासाद को समचोरस भूमिका आठ भाग करे। उनमे कोण और प्रतिकर्ण एक एक भाग का, भद्रार्ध डेढ भाग और भद्रनन्दी आधा भाग बनावे। भद्र का निर्गम एक भाग रक्खे, इस प्रकार चारो दिशा मे व्यवस्था करें । कोण और प्रतिकर्ण के ऊपर एक एक केसरी शृंग और उसके ऊपर एक एक तिलक चढावे । भद्रनन्दी के ऊपर तिलक और भद्र के ऊपर एक उरुशृंग चढावें । यह कुमुदनामका प्रासाद सर्वदेवो को और कुंथुजिनदेव को वल्लभ है ॥८३ से ८६॥ शृंगसंख्या—कोणे २०, प्ररथे ४०, भद्रे ४, एक शिखर, कुल ६५ शृंग । तिलक संख्या— कोणे ४, प्ररथे ८, और नन्दी पर ८, कुल २० तिलक । ३४-शक्तिदप्रासाद— तद्रूपं च प्रकर्त्तव्यं रथे तिलकं दापयेत् । शक्तिदो नाम विज्ञेयः श्रीदेवीषु सुखावहः ॥८७॥ इति शक्तिदप्रासादः ॥३४॥ कुमुदप्रासाद के प्ररथ के ऊपर एक २ तिलक अधिक बढ़ाने से शक्तिद नाम का प्रासाद होता है । वह लक्ष्मीदेवी को सुखकारक है ॥८७॥ शृंगसंख्या—पूर्ववत् ६५ और तिलक-कोणे ४, प्ररथे १६, नन्दी पर ८ कुल २८ । प्रा० २६

२०२ प्रसादमण्डने ३५-हर्षणप्रासाद— कर्णोर्ध्वे भृङ्गं दातव्यं प्रासादो हर्षणस्तथा । इति हर्षणप्रासादः ॥३५॥ शक्तिद प्रासाद के कोणो के ऊपर एक २ शृंग अधिक चढ़ाने से हर्षण नामका प्रासाद होता है । शृंगसंख्या—कोणो २४, प्र रथे ४०, भद्रे ४, एक शिखर, कुल ६९ शृंग । तिलक पूर्ववत् २८ । ३६-भूषणप्रासाद— कर्णोर्ध्वे तिलकं दद्यात् प्रासादो भूषणस्तथा ॥८८॥ इति भूषणप्रासादः ॥३६॥ हर्षणप्रासाद के कोणो के ऊपर एक तिलक अधिक चढावे तो भूषण नामका प्रासाद होता है ॥८८॥ शृंगसंख्या—पूर्ववत् ६९ और तिलक ३२ । विभक्ति अठारहवीं । ३७-अरनाथजिनवल्लभ-कमलकन्दप्रासाद— चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे चाष्टभागविभाजिते । कर्णो द्विभागिको ज्ञेयो भद्रार्धं च द्विभागिकम् ॥८९॥ कर्णो च शृङ्गमेकं तु केसरीं च निधीयते । भद्रे चैवोद्गमः कार्यो जिनेन्द्रे चारनाथके ॥९०॥ इति त्वं विद्धि भो वत्स ! प्रासादो जिनवल्लभः । कमलकन्दनामोऽयं जिनशासनमार्गतः ॥९१॥ इति अरनाथजिनवल्लभः कमलकन्दप्रासादः ॥३७॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका आठ भाग करें। उनमें दो भाग का कोण और दो भाग का भद्रार्ध बनावें । कोणो के ऊपर एक २ केसरी शृंग चढ़ावें और भद्र के ऊपर उद्गम बनावें । ऐसा अरनाथ जिन के लिये कमलकन्द नाम का प्रासाद हे वत्स ! तूं जान ॥८९ से ९१॥ शृङ्गसंख्या—कोणो २०, एक शिखर, कुल २१ शृंग ।

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः २०३ ३८-श्रीशैलप्रासाद— कर्णौ च तिलकं ज्ञेयं श्रीशैल ईश्वरप्रियः । इति श्रीशैलप्रासादः ॥३८॥ कमलकन्द प्रासाद के कोणे के ऊपर एक २ तिलक भी चढ़ाने से श्रीशैल नाम का प्रासाद होता है, वह ईश्वर को प्रिय है। शृंगसंख्या—पूर्ववत् २१ और तिलक ४ कोणे । ३६-अरिनाशन प्रासाद— भद्रे चैवोरुचत्वारि प्रासादस्त्वरिनाशनः ॥६२॥ इत्यरिनाशनप्रासादः ॥३६॥ श्रीशैलप्रासाद के भद्र के ऊपर एक २ उरुशृंग चढाने से अरिनाशन नामका प्रासाद होता है ॥६२॥ शृंगसंख्या—कोणे २०, भद्रे ४, एक शिखर, कुल २५ शृंग और तिलक ४ कोणे । विभक्ति उन्नीसवीं । ४०-श्रीमल्लिजिनवल्लभ-महेन्द्रप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे द्वादशपदभाजिते । कर्णो भागद्वय कार्यः प्रतिरथश्च सार्धकः ॥६३॥ सार्धभागकं भद्रार्धं चार्धं नन्दीद्वयं भवेत् । कर्णो क्रमद्वयं कार्यं प्रतिरथे तथैव च ॥६४॥ द्वादश उरुशृङ्गाणि स्थापयेच्च चतुर्दिशि । महेन्द्रनामः प्रासादो जिनेन्द्रमल्लिवल्लभः ॥६५॥ इति मल्लिजिनवल्लभो महेन्द्रप्रासाद. ॥४०॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बारह भाग करे । उनमे दो भाग का कोण, डेढ़ भागका प्रतिरथ, डेढ़ भागका भद्रार्ध, कर्णानंदी और भद्रनन्दी आधे २ भाग की करे । प्रतिरथ और कोणे के ऊपर केसेरी और सर्वतोभद्र, ये दो क्रम और भद्र के ऊपर बारह उरुशृग चढावे । ऐसा महेन्द्र नामका प्रासाद मल्लिजिनेन्द्र को वल्लभ है ॥६३ से ६५॥ शृंगसंख्या—कोणे ५६, प्ररथे ११२, भद्रे १२, एक शिखर, कुल १८१ शृंग ।

२०४ प्रासादमण्डने ४१-मानवेन्द्रप्रासाद— रथोर्ध्वे तिलकं दद्यान्मानवेन्द्रोऽथ नामतः । इति मानवेन्द्रप्रासादः ॥४१॥ महेन्द्रप्रासाद के प्रतिरथ के ऊपर एक २ तिलक भी चढ़ावें तो मानवेन्द्र नामका प्रासाद होता है। शृंगसंख्या पूर्ववत् १८१ और तिलक ८ प्ररथे । ४२-पापनाशनप्रासाद— कर्णोर्ध्वे तिलकं दद्यात् प्रासादः पापनाशनः ॥६६॥ इति पापनाशनप्रासादः ॥४२॥ मानवेन्द्रप्रासाद के कोणे के ऊपर एक २ तिलक भी चढ़ावें तो पापनाशन नामका प्रासाद होता है ॥६६॥ शृंगसंख्या पूर्ववत् १८१ । तिलक-कोणे ४, और प्ररथे ८ कुल १२ तिलक । विभक्ति बीसवीं । ४३-मानतुष्टि नामका मुनिसुव्रतप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्दशविभाजिते । बाहुद्वयं रथं कर्णं भद्रार्धं त्रयमांगिकम् ॥६७॥ श्रीवत्सं केसरीं देयं कर्णो रथे क्रमद्वयम् । द्वादशैवोरुभृङ्गाणि स्थापयेच्च चतुर्दिशि ॥६८॥ मानसतुष्टिनामोऽयं प्रासादो मुनिसुव्रतः । इति मानसतुष्टि नाम मुनिसुव्रतप्रासादः ॥४३॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका चौदह भाग करे । उनमें दो भागका कोण, दो भागका प्ररथ और तीन भागका भद्रार्ध करे । कोण और प्ररथ के ऊपर केसरी और श्रीवत्स ये दो क्रम चढ़ावे । तथा भद्र के ऊपर कुल बारह उरुशृंग चढ़ावें । ऐसा मानसतुष्टि नामका मुनिसुव्रत प्रासाद है ॥६७-६८॥ शृंगसंख्या-कोणे २४, प्ररथे ४८, भद्रे १२, एक शिखर, कुल ८५ शृंग । ४४-मनोल्याचन्द्रप्रासाद— तद्रूपे रथे तिलकं मनोल्याचन्द्रो नामतः ॥६६॥ इति मनोल्याचन्द्रप्रासादः ॥४४॥

or "कोणे"? "कोणे ५६".

Line 28: कोणे ४ प्ररथे ८ कुल १२ तिलक । Wait, does it say "कोणे ४ प्ररथे ८ कुल १२ तिलक ।"? Yes: "कोणे ४ प्ररथे ८ कुल १२ तिलक ।"

Everything is verified and matches the printed page precisely.अथ जितेन्द्रप्रासादाध्यायः २०५ मानसतुष्टिप्रासाद के प्ररथ के ऊपर एक २ तिलक चढावे तो मनोल्याचन्द्र नामका प्रासाद होता है ॥६६॥ शृंगसंख्या पूर्ववत् ८५ और तिलक ८ प्ररथे । ४५-श्रीभवप्रासाद— मनोल्याचन्द्रसंस्थाने कर्णे न्यसेत् द्विकेसरीम् । श्रीभवनामो विज्ञेयः कर्त्तव्यश्च त्रिमूर्त्तये ॥१००॥ इतिश्रीभवनामप्रासादः ॥४५॥ मनोल्याचंद्र प्रासाद के कोणे के ऊपर शृंगो के बदले मे दो केसरी शृंग चढावे तो श्रीभवनामका प्रासाद होता है। वह त्रिमूर्त्ति (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) के लिये बनावे ॥१००॥ शृंगसंख्या—कर्ण ४०

२०६ प्रासादमण्डने विभक्ति इक्कीसवीं B । ४७-सुमतिकीर्त्तिप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे षड्विंशपदभाजिते । कर्णौ भागाश्च चत्वारः प्रतिकर्णास्तथैव च ॥१०४॥ भद्रं दिग्भागिकं ज्ञेयं चतुर्दिक्षु व्यवस्थितम् । कर्णे क्रमत्रयं कार्यं प्रतिकर्णे क्रमद्वयम् ॥१०५॥ द्वादशैवोरुशृङ्गाणि प्रत्यङ्गानि द्वात्रिंशकम् । मन्दिरं प्रथमं कर्म सर्वतोभद्रमेव च ॥१०६॥ केसरीं तृतीयं कर्म ऊर्ध्वे मञ्जरी शोभिता । सुमतिकीर्त्तिनामोऽयं नमिनाथस्य वल्लभः ॥१०७॥ इति नमिजिनवल्लभः सुमतिकीर्त्तिप्रासादः ॥४७॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका छब्बीस भाग करें। उनमें चार भाग का कोण, चार भाग का प्ररथ और दस भाग का पूरा भद्र करें। कोणो के ऊपर तीन क्रम, प्ररथ के ऊपर दो क्रम, भद्र के ऊपर कुल बारह उरुशृंग और बत्तीस प्रत्यंग चढ़ावें । उसके ऊपर शिखर शोभायमान करे, ऐसा सुमतिकीर्त्ति नामका प्रासाद श्रीनमिनाथ जिनको प्रिय है ॥१०४ से १०७॥ शृंगसंख्या—कोणे १५६, प्ररथे ११२, भद्रे १२, प्रत्यंग ३२, एक शिखर, कुल ३१३ शृंग। यदि प्ररथ के ऊपर मंदिर और सर्वतोभद्र ये दो क्रम रखा जाय तो शृंगसंख्या— कोणे १५६, प्ररथे २७२, भद्रे १२, प्रत्यंग ३२, एक शिखर, कुल ४७३ शृंग। ४८-सुरेन्द्रप्रासाद— तद्रूपे च प्रकर्त्तव्यो रथे शृङ्गं च दापयेत् । सुरेन्द्र इति नामायं प्रासादः सुरवल्लभः ॥१०८॥ इति सुरेन्द्रनामप्रासादः ॥४८॥ सुमतिकीर्त्ति प्रासाद के प्ररथके ऊपर एक शृंग अधिक चढ़ावे तो सुरेन्द्र नामका प्रासाद होता है, वह देवो को प्रिय है ॥१०८॥ शृंगसख्या—कोणे १५६, प्ररथे २८०, भद्रे १२, प्रत्यंग ३२, एक शिखर कुल ४८१ शृंग।

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः २०७ ४९-राजेन्द्रप्रासाद— तद्रूपे च प्रकर्त्तव्य उरुशृङ्गाणि¹ षोडश । पूजनाल्लभते राज्यं स्वर्गे चैवं महीतले ॥१०९॥ इति राजेन्द्रप्रासादः ॥४९॥ सुरेन्द्रप्रासाद के भद्रके ऊपर बारह के बदले सोलह उरुशृंग चढ़ाने से राजेन्द्र नामका प्रासाद होता है । उसका पूजन करने से पृथ्वी के ऊपर और स्वर्ग मे राज्य प्राप्त होता है ॥१०९॥ शृंगसंख्या—भद्रे १६ बाकी पूर्ववत्, कुल ४८५ शृंग । विभक्ति बाईसवीं । ५०-नेमेन्द्रेश्वर प्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे द्वाविंशपदभाजिते । बाहुरिन्दुयुग्मरूप-द्वीन्दुभागाः क्रमेण च ॥११०॥ भद्रार्थं च द्वयं भागं स्थापयेत्तु चतुर्दिशि । केसरीं सर्वतोभद्रं कर्णयो चैवं क्रमद्वयम् ॥१११॥ केसरीं तिलकं चैव रथोर्ध्वे तु प्रकीर्त्तितम् । कर्णिकानन्दिकायां च शृङ्गं च तिलकं न्यसेत् ॥११२॥ भद्रे चैवोरुचत्वारि प्रत्यङ्गानि च षोडश । नेमेन्द्रेश्वरनामोऽयं प्रासादो नेमिवल्लभः ॥११३॥ इति नेमेन्द्रेश्वरप्रासादः ॥५०॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बाईस भाग करे । उनमे दो भाग का कोणा, एक भागकी कोणी, दो भागका प्रतिकर्ण, एक भाग कोणी, दो भाग का उपरथ, एक भागकी नन्दी और दो भाग का भद्रार्थ रक्खे । कोणे के ऊपर केसरी और सर्वतोभद्र, ये दो क्रम, प्रतिकर्ण और उपरथ के ऊपर केसरी क्रम और एक तिलक, कोणी और नंदियो के ऊपर एक शृंग और एक तिलक, भद्र के ऊपर चार २ उरुशृंग, और सोलह प्रत्यग चढावे । ऐसा नेमेन्द्रेश्वर नाम का प्रासाद श्री नेमिनाथजिनदेव को प्रिय है ॥११० से ११३॥ १. 'उरुशृङ्गं च पञ्चमम्' । पाठान्तरे ।

२०८ प्रासादमण्डने शृंग संख्या—कोणे ५६, कोणीपर ८, प्ररथे ४०, कोणीपर ८, ऊपरथे ४०, नंदी पर ८, भद्रे १६, प्रत्यंग १६, एक शिखर कुल १६३ शृंग। तिलक संख्या—प्ररथे ८, ऊपरथे ८, कर्णनंदी पर ८, प्ररथनंदी पर ८, भद्रनदी पर ८, कुल ४० तिलक । ५१-यतिभूषणप्रासाद— तत्तुल्यं तत्प्रमाणं च रथे शृङ्गं च दापयेत् । वल्लभः सर्वदेवानां प्रासादो यतिभूषणः ॥११४॥ इति यतिभूषणप्रासादः ॥५१॥ नेमेद्रेश्वर प्रासाद के प्ररथ और उपरथ ऊपर के तिलक के बदले एक एक शृङ्ग चढाने से यतिभूषण नाम का प्रासाद होता है, वह सब देवों को प्रिय है ॥११४॥ शृंगसंख्या—प्ररथे ४८, उपरथे ४८ बाकी पूर्ववत् कुल २०६ शृंग। तिलक कुल २४ तीनों नन्दी पर । ५२-सुपुष्पप्रासाद— तद्रूपं तत्प्रमाणं च रथे दद्याच्च केसरीम् । सुपुष्पो नाम विज्ञेयः प्रासादः सुरवल्लभः ॥११५॥ इति सुपुष्पनामप्रासादः ॥५२॥ यतिभूषण प्रासाद के प्ररथ और उपरथ ऊपर के शृंग के बदले में एक एक केसरी क्रम चढाने से सुपुष्प नामका प्रासाद होता है। वह देवों को प्रिय है ॥११०५॥ शृंग सङ्ख्या—परथे ८०, ऊपरथे ८० बाकी पूर्ववत् कुल २७३ शृंग। तिलक २४ पूर्ववत् विभक्ति तेईसवीं । ५३-पार्श्ववल्लभप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे 'षड्विंशपदभाजिते । कर्णात्तु गर्भपर्यन्तं विभागानां तु लक्षणम् ॥११६॥ वेदरूषगुणोन्द्वो२ भद्रार्धं तु चतुष्पदम् । श्रीवत्सं केसरीं चैव रथे कर्णो च दापयेत् ॥११७॥ १. 'अष्टविंशति भाजिते' । पाठान्तरे । २. 'द्वय' ।

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः २०६ कर्णिकायां ततः शृङ्ग-मष्टौ प्रत्यङ्गानि च । भद्रे चैवोरुचत्वारि प्रासादः पार्श्ववल्लभः ॥११८॥ इति श्री पार्श्ववल्लभप्रासाद ॥५३॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका छब्बीस भाग करे । उन मे चार भाग का कोण, एक भाग की कोणी, तीन भाग का प्रतिरथ, एक भाग की नन्दी और भद्रार्ध चार भाग का रखे । कोण और प्ररथ के ऊपर एक एक केसरीक्रम और एक एक श्रीवत्सशृंग चढावें । कोणी और नन्दी के ऊपर एक एक शृंग चढावे । आठ प्रत्यङ्ग और भद्र के ऊपर चार चार उरुशृंग चढावें । ऐसा पार्श्वनाथवल्लभ नाम का प्रासाद है ॥११६ से ११८॥ शृङ्ग संख्या—कोणे २४, प्ररथे ४८, भद्रे १६ कोणी पर ८, नंदी पर ८, प्रत्यग ८, एक शिखर कुल ११३ शृंग । ५४-पद्मावतीप्रासाद— कर्णों च तिलकं दद्यात् प्रासादस्तत्स्वरूपकः । पद्मावती च नामेति प्रासादो देवीवल्लभः ॥११९॥ इति पद्मावतीप्रासादः ॥५४॥ पार्श्ववल्लभ प्रासाद के कोणे के ऊपर एक एक तिलक भी चढावे तो पद्मावती नामका प्रासाद होता है । यह देवी को प्रिय है ॥११९॥ शृंग संख्या पूर्ववत् ११३ । तिलक ४ कोणे के पर । ५५-रूपवल्लभप्रासाद— तद्रूपं च प्रकर्त्तव्यं प्रतिकर्णों कर्णसादृशम् । जिनेन्द्रायतनं चैव प्रासादो रूपवल्लभः ॥१२०॥ इति रूपवल्लभप्रासादः ॥५५॥ पद्मावती प्रासाद के प्ररथ के ऊपर भी एक एक तिलक चढावे तो रूपवल्लभनामका जिनेन्द्रप्रासाद होता है ॥१२०॥ शृंग संख्या—पूर्ववत् ११३ । तिलक १२ । चार कोणे और आठ प्ररथे । प्रा० २७

२१० प्रासादमण्डने विभक्ति चौबीसवीं । ५६-वीरविक्रम-महीधरप्रासाद- चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्विंशतिभाजिते । कर्णस्त्रिभागिको ज्ञेयः प्रतिकर्णश्च तत्समम् ॥१२१॥ कर्णिका नन्दिका भागा भद्रार्धं च चतुष्पदम् । श्रीवत्सं केसरीं चैव सर्वतोभद्रमेव च ॥१२२॥ रथे वर्गे च दातव्य-मष्टौ प्रत्यङ्गानि च । भद्रे चैवोरुचत्वारि कर्णिकायां शृङ्गोत्तमम् ॥१२३॥ वीरविक्रमनामोऽयं प्रासादो जिनवल्लभः । महीधरश्च नामायं पूजिते फलदायकः ॥१२४॥ इति श्री महावीरजिनवल्लभो वीरविक्रमप्रासादः ॥५३॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका चौबीस भाग करें। उनमें कोण और प्रतिकर्ण तीन तीन भाग, कोणी और नन्दी एक एक भाग और भद्रार्ध चार भाग रखे । कोण और प्ररथ के ऊपर केसरी और सर्वतोभद्र ये दो क्रम और एक श्रीवत्सशृंग चढावें, भद्र के ऊपर चार उरुशृंग, तथा कोणी और नंदी के ऊपर एक श्रीवत्सशृंग और आठ प्रत्यंग चढावे । ऐसा वीरविक्रम नाम का प्रासाद जिनदेव को प्रिय है ॥१२१ से १२४॥ शृंगसंख्या-कोणे ६०, प्ररथे १२०, प्रत्यंग ८, भद्रे १६, कोणी पर ८ नंदी पर ८, एक शिखर, कुल २२१ शृंग । ५७-अष्टापदप्रासाद- तद्रूपे च प्रकर्त्तव्ये कर्णोर्ध्वे तिलकं न्यसेत् ।, अष्टापदश्च नामायं प्रासादो जिनवल्लभः ॥१२५॥ इत्यष्टापदप्रासादः ॥५४॥ वीर विक्रम प्रासाद के कोणे के ऊपर एक एक तिलक भी चढावें तो अष्टापद नामका प्रासाद होता है । वह जिनदेव को प्रिय है ॥१२५॥ शृंग संख्या-पूर्ववत् २२१ । तिलक-४ कोणे के ऊपर ।

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः २११ ५८-तुष्टिपुष्टिदप्रासाद— तद्रूपं च प्रकर्त्तव्य - मुरुशृङ्गं च पञ्चमम् । तुष्टिपुष्टिदनामोऽयं प्रासादो जिनवल्लभः ॥१२६॥ इति तुष्टिपुष्टिदप्रासादः ॥५५॥ अष्टापदप्रासाद के भद्र के ऊपर चार के बदले पाच उरुशृंग चढावे तो तुष्टिपुष्टिद नामका प्रासाद होता है। वह जिनदेव को प्रिय है ॥१२६॥ शृंग संख्या—भद्रे २० बाकी पूर्ववत् कुल २२५ शृंग और तिलक ४ कोणे जिनप्रासाद प्रशंसा— प्रासादाः पूजिता लोके विश्वकर्मणा भाषिताः । चतुर्विंशविभक्तीनां जिनेन्द्राणां विशेषतः ॥१२७॥ उपरोक्त विश्वकर्मा ने कहे हुए चौवीस विभक्ति के जिनेन्द्रदेवो के प्रासाद विशेष प्रकार से पूजनीय हैं ॥१२७॥ चतुर्दिशि चतुर्द्वाराः पुरमध्ये सुखावहाः । भ्रमाश्च विभ्रमाश्चैव प्रशस्ताः सर्वकामदाः ॥१२८॥ चारो दिशाओ मे द्वारवाले अर्थात् चार द्वारवाले, भ्रमवाले अथवा बिना भ्रम के जिनेन्द्र प्रासाद नगर मे हो तो प्रजा को सुख देने वाले है । तथा प्रशस्त हैं और सब इच्छित फल को देने वाले है ॥१२८॥ शान्तिदाः पुष्टिदाश्चैव प्रजाराज्यसुखावहाः । अश्वैर्गजैर्बलियानै-र्महिषीनन्दीभिस्तथा ॥१२६॥ सर्वश्रियमाप्नुवन्ति स्थापिताश्च महीतले । जिनेन्द्रदेवो के प्रासाद शान्ति देने वाले है। पुष्टि देनेवाले और राजा प्रजा को सुख देनेवाले है। एवं इस पृथ्वी के ऊपर जिनेन्द्र देवो के प्रासाद स्थापित करने से घोडे, हाथी, बैल, भैस और गाय आदि की सब सम्पत्तियो को देनेवाले हैं ॥१२६॥ नगरे ग्रामे पुरे च प्रासादा ऋषभादयः ॥१३०॥ जगत्या मण्डपैर्युक्ताः क्रीयन्ते वसुधातले । सुलभं दीयते राज्यं स्वर्गे चैवं महीतले ॥१३१॥

२१२ प्रासादमण्डने नगर, ग्राम और पुरके मध्य में जगती और मंडप वाले ऋषभ आदि जिनप्रासाद पृथ्वी- तल मे किया जाता है। जिसे स्वर्ग और पृथ्वी मे राज्य प्राप्ति सुलभ होती है ॥१२० से १३१॥ दक्षिणोत्तरमुखाश्च प्राचीपश्चिमदिङ्मुखाः। वीतरागस्य प्रासादाः पुरमध्ये सुखावहाः ॥१३२॥ इति श्री विश्वकर्मकृतज्ञानप्रकाशदीपार्णवे वास्तुविद्यायां जयपृच्छता जिनप्रासादाधिकारः समाप्तः ॥ दक्षिण, उत्तर, पूर्व और पश्चिम, इन, चारों दिशा के मुख वाले वीतराग देव के प्रासाद नगर मे हो तो सुख कारक है ॥१३२॥ इति पं० भगवानदास जैन कृत ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के वास्तु- विद्या के जिनप्रासादाधिकार की सुबोधिनी नाम्नी भाषाटीका समाप्ता ।