प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० प्रासादमण्डने विभक्ति चौबीसवीं । ५६-वीरविक्रम-महीधरप्रासाद- चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्विंशतिभाजिते । कर्णस्त्रिभागिको ज्ञेयः प्रतिकर्णश्च तत्समम् ॥१२१॥ कर्णिका नन्दिका भागा भद्रार्धं च चतुष्पदम् । श्रीवत्सं केसरीं चैव सर्वतोभद्रमेव च ॥१२२॥ रथे वर्गे च दातव्य-मष्टौ प्रत्यङ्गानि च । भद्रे चैवोरुचत्वारि कर्णिकायां शृङ्गोत्तमम् ॥१२३॥ वीरविक्रमनामोऽयं प्रासादो जिनवल्लभः । महीधरश्च नामायं पूजिते फलदायकः ॥१२४॥ इति श्री महावीरजिनवल्लभो वीरविक्रमप्रासादः ॥५३॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका चौबीस भाग करें। उनमें कोण और प्रतिकर्ण तीन तीन भाग, कोणी और नन्दी एक एक भाग और भद्रार्ध चार भाग रखे । कोण और प्ररथ के ऊपर केसरी और सर्वतोभद्र ये दो क्रम और एक श्रीवत्सशृंग चढावें, भद्र के ऊपर चार उरुशृंग, तथा कोणी और नंदी के ऊपर एक श्रीवत्सशृंग और आठ प्रत्यंग चढावे । ऐसा वीरविक्रम नाम का प्रासाद जिनदेव को प्रिय है ॥१२१ से १२४॥ शृंगसंख्या-कोणे ६०, प्ररथे १२०, प्रत्यंग ८, भद्रे १६, कोणी पर ८ नंदी पर ८, एक शिखर, कुल २२१ शृंग । ५७-अष्टापदप्रासाद- तद्रूपे च प्रकर्त्तव्ये कर्णोर्ध्वे तिलकं न्यसेत् ।, अष्टापदश्च नामायं प्रासादो जिनवल्लभः ॥१२५॥ इत्यष्टापदप्रासादः ॥५४॥ वीर विक्रम प्रासाद के कोणे के ऊपर एक एक तिलक भी चढावें तो अष्टापद नामका प्रासाद होता है । वह जिनदेव को प्रिय है ॥१२५॥ शृंग संख्या-पूर्ववत् २२१ । तिलक-४ कोणे के ऊपर ।