भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

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अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः २०६ कर्णिकायां ततः शृङ्ग-मष्टौ प्रत्यङ्गानि च । भद्रे चैवोरुचत्वारि प्रासादः पार्श्ववल्लभः ॥११८॥ इति श्री पार्श्ववल्लभप्रासाद ॥५३॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका छब्बीस भाग करे । उन मे चार भाग का कोण, एक भाग की कोणी, तीन भाग का प्रतिरथ, एक भाग की नन्दी और भद्रार्ध चार भाग का रखे । कोण और प्ररथ के ऊपर एक एक केसरीक्रम और एक एक श्रीवत्सशृंग चढावें । कोणी और नन्दी के ऊपर एक एक शृंग चढावे । आठ प्रत्यङ्ग और भद्र के ऊपर चार चार उरुशृंग चढावें । ऐसा पार्श्वनाथवल्लभ नाम का प्रासाद है ॥११६ से ११८॥ शृङ्ग संख्या—कोणे २४, प्ररथे ४८, भद्रे १६ कोणी पर ८, नंदी पर ८, प्रत्यग ८, एक शिखर कुल ११३ शृंग । ५४-पद्मावतीप्रासाद— कर्णों च तिलकं दद्यात् प्रासादस्तत्स्वरूपकः । पद्मावती च नामेति प्रासादो देवीवल्लभः ॥११९॥ इति पद्मावतीप्रासादः ॥५४॥ पार्श्ववल्लभ प्रासाद के कोणे के ऊपर एक एक तिलक भी चढावे तो पद्मावती नामका प्रासाद होता है । यह देवी को प्रिय है ॥११९॥ शृंग संख्या पूर्ववत् ११३ । तिलक ४ कोणे के पर । ५५-रूपवल्लभप्रासाद— तद्रूपं च प्रकर्त्तव्यं प्रतिकर्णों कर्णसादृशम् । जिनेन्द्रायतनं चैव प्रासादो रूपवल्लभः ॥१२०॥ इति रूपवल्लभप्रासादः ॥५५॥ पद्मावती प्रासाद के प्ररथ के ऊपर भी एक एक तिलक चढावे तो रूपवल्लभनामका जिनेन्द्रप्रासाद होता है ॥१२०॥ शृंग संख्या—पूर्ववत् ११३ । तिलक १२ । चार कोणे और आठ प्ररथे । प्रा० २७