प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०८ प्रासादमण्डने शृंग संख्या—कोणे ५६, कोणीपर ८, प्ररथे ४०, कोणीपर ८, ऊपरथे ४०, नंदी पर ८, भद्रे १६, प्रत्यंग १६, एक शिखर कुल १६३ शृंग। तिलक संख्या—प्ररथे ८, ऊपरथे ८, कर्णनंदी पर ८, प्ररथनंदी पर ८, भद्रनदी पर ८, कुल ४० तिलक । ५१-यतिभूषणप्रासाद— तत्तुल्यं तत्प्रमाणं च रथे शृङ्गं च दापयेत् । वल्लभः सर्वदेवानां प्रासादो यतिभूषणः ॥११४॥ इति यतिभूषणप्रासादः ॥५१॥ नेमेद्रेश्वर प्रासाद के प्ररथ और उपरथ ऊपर के तिलक के बदले एक एक शृङ्ग चढाने से यतिभूषण नाम का प्रासाद होता है, वह सब देवों को प्रिय है ॥११४॥ शृंगसंख्या—प्ररथे ४८, उपरथे ४८ बाकी पूर्ववत् कुल २०६ शृंग। तिलक कुल २४ तीनों नन्दी पर । ५२-सुपुष्पप्रासाद— तद्रूपं तत्प्रमाणं च रथे दद्याच्च केसरीम् । सुपुष्पो नाम विज्ञेयः प्रासादः सुरवल्लभः ॥११५॥ इति सुपुष्पनामप्रासादः ॥५२॥ यतिभूषण प्रासाद के प्ररथ और उपरथ ऊपर के शृंग के बदले में एक एक केसरी क्रम चढाने से सुपुष्प नामका प्रासाद होता है। वह देवों को प्रिय है ॥११०५॥ शृंग सङ्ख्या—परथे ८०, ऊपरथे ८० बाकी पूर्ववत् कुल २७३ शृंग। तिलक २४ पूर्ववत् विभक्ति तेईसवीं । ५३-पार्श्ववल्लभप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे 'षड्विंशपदभाजिते । कर्णात्तु गर्भपर्यन्तं विभागानां तु लक्षणम् ॥११६॥ वेदरूषगुणोन्द्वो२ भद्रार्धं तु चतुष्पदम् । श्रीवत्सं केसरीं चैव रथे कर्णो च दापयेत् ॥११७॥ १. 'अष्टविंशति भाजिते' । पाठान्तरे । २. 'द्वय' ।