प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः २०७ ४९-राजेन्द्रप्रासाद— तद्रूपे च प्रकर्त्तव्य उरुशृङ्गाणि¹ षोडश । पूजनाल्लभते राज्यं स्वर्गे चैवं महीतले ॥१०९॥ इति राजेन्द्रप्रासादः ॥४९॥ सुरेन्द्रप्रासाद के भद्रके ऊपर बारह के बदले सोलह उरुशृंग चढ़ाने से राजेन्द्र नामका प्रासाद होता है । उसका पूजन करने से पृथ्वी के ऊपर और स्वर्ग मे राज्य प्राप्त होता है ॥१०९॥ शृंगसंख्या—भद्रे १६ बाकी पूर्ववत्, कुल ४८५ शृंग । विभक्ति बाईसवीं । ५०-नेमेन्द्रेश्वर प्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे द्वाविंशपदभाजिते । बाहुरिन्दुयुग्मरूप-द्वीन्दुभागाः क्रमेण च ॥११०॥ भद्रार्थं च द्वयं भागं स्थापयेत्तु चतुर्दिशि । केसरीं सर्वतोभद्रं कर्णयो चैवं क्रमद्वयम् ॥१११॥ केसरीं तिलकं चैव रथोर्ध्वे तु प्रकीर्त्तितम् । कर्णिकानन्दिकायां च शृङ्गं च तिलकं न्यसेत् ॥११२॥ भद्रे चैवोरुचत्वारि प्रत्यङ्गानि च षोडश । नेमेन्द्रेश्वरनामोऽयं प्रासादो नेमिवल्लभः ॥११३॥ इति नेमेन्द्रेश्वरप्रासादः ॥५०॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बाईस भाग करे । उनमे दो भाग का कोणा, एक भागकी कोणी, दो भागका प्रतिकर्ण, एक भाग कोणी, दो भाग का उपरथ, एक भागकी नन्दी और दो भाग का भद्रार्थ रक्खे । कोणे के ऊपर केसरी और सर्वतोभद्र, ये दो क्रम, प्रतिकर्ण और उपरथ के ऊपर केसरी क्रम और एक तिलक, कोणी और नंदियो के ऊपर एक शृंग और एक तिलक, भद्र के ऊपर चार २ उरुशृंग, और सोलह प्रत्यग चढावे । ऐसा नेमेन्द्रेश्वर नाम का प्रासाद श्री नेमिनाथजिनदेव को प्रिय है ॥११० से ११३॥ १. 'उरुशृङ्गं च पञ्चमम्' । पाठान्तरे ।