प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः २११ ५८-तुष्टिपुष्टिदप्रासाद— तद्रूपं च प्रकर्त्तव्य - मुरुशृङ्गं च पञ्चमम् । तुष्टिपुष्टिदनामोऽयं प्रासादो जिनवल्लभः ॥१२६॥ इति तुष्टिपुष्टिदप्रासादः ॥५५॥ अष्टापदप्रासाद के भद्र के ऊपर चार के बदले पाच उरुशृंग चढावे तो तुष्टिपुष्टिद नामका प्रासाद होता है। वह जिनदेव को प्रिय है ॥१२६॥ शृंग संख्या—भद्रे २० बाकी पूर्ववत् कुल २२५ शृंग और तिलक ४ कोणे जिनप्रासाद प्रशंसा— प्रासादाः पूजिता लोके विश्वकर्मणा भाषिताः । चतुर्विंशविभक्तीनां जिनेन्द्राणां विशेषतः ॥१२७॥ उपरोक्त विश्वकर्मा ने कहे हुए चौवीस विभक्ति के जिनेन्द्रदेवो के प्रासाद विशेष प्रकार से पूजनीय हैं ॥१२७॥ चतुर्दिशि चतुर्द्वाराः पुरमध्ये सुखावहाः । भ्रमाश्च विभ्रमाश्चैव प्रशस्ताः सर्वकामदाः ॥१२८॥ चारो दिशाओ मे द्वारवाले अर्थात् चार द्वारवाले, भ्रमवाले अथवा बिना भ्रम के जिनेन्द्र प्रासाद नगर मे हो तो प्रजा को सुख देने वाले है । तथा प्रशस्त हैं और सब इच्छित फल को देने वाले है ॥१२८॥ शान्तिदाः पुष्टिदाश्चैव प्रजाराज्यसुखावहाः । अश्वैर्गजैर्बलियानै-र्महिषीनन्दीभिस्तथा ॥१२६॥ सर्वश्रियमाप्नुवन्ति स्थापिताश्च महीतले । जिनेन्द्रदेवो के प्रासाद शान्ति देने वाले है। पुष्टि देनेवाले और राजा प्रजा को सुख देनेवाले है। एवं इस पृथ्वी के ऊपर जिनेन्द्र देवो के प्रासाद स्थापित करने से घोडे, हाथी, बैल, भैस और गाय आदि की सब सम्पत्तियो को देनेवाले हैं ॥१२६॥ नगरे ग्रामे पुरे च प्रासादा ऋषभादयः ॥१३०॥ जगत्या मण्डपैर्युक्ताः क्रीयन्ते वसुधातले । सुलभं दीयते राज्यं स्वर्गे चैवं महीतले ॥१३१॥