प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ जिनेन्द्रप्रासादाध्याय' २०१ विभक्ति सत्रहवीं । ३३-कुंथुजिनवल्लभ कुमुदप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चाष्टभागविभाजिते । कर्णः स्यादेकभागश्च प्रतिकर्णस्तथैव च ॥८३॥ नन्दिका चैव भागार्धा त्रिपदं भद्रविस्तरम् । निर्गमं पदमानेन स्थापयेच्च चतुर्दिशि ॥८४॥ कर्णे च केसरीं दद्यात् तदूर्ध्वे तिलकं न्यसेत् । तत्सदृशं प्रतिकर्णे नन्द्यां तु तिलकं न्यसेत् ॥८५॥ भद्रे च शृंगमेकं तु कुमुदो नाम नामतः । वल्लभः सर्वदेवानां जिनेन्द्रकुंथुवल्लभः ॥८६॥ इति कुंथुनाथवल्लभः कुमुदप्रासादः ॥३३॥ प्रासाद को समचोरस भूमिका आठ भाग करे। उनमे कोण और प्रतिकर्ण एक एक भाग का, भद्रार्ध डेढ भाग और भद्रनन्दी आधा भाग बनावे। भद्र का निर्गम एक भाग रक्खे, इस प्रकार चारो दिशा मे व्यवस्था करें । कोण और प्रतिकर्ण के ऊपर एक एक केसरी शृंग और उसके ऊपर एक एक तिलक चढावे । भद्रनन्दी के ऊपर तिलक और भद्र के ऊपर एक उरुशृंग चढावें । यह कुमुदनामका प्रासाद सर्वदेवो को और कुंथुजिनदेव को वल्लभ है ॥८३ से ८६॥ शृंगसंख्या—कोणे २०, प्ररथे ४०, भद्रे ४, एक शिखर, कुल ६५ शृंग । तिलक संख्या— कोणे ४, प्ररथे ८, और नन्दी पर ८, कुल २० तिलक । ३४-शक्तिदप्रासाद— तद्रूपं च प्रकर्त्तव्यं रथे तिलकं दापयेत् । शक्तिदो नाम विज्ञेयः श्रीदेवीषु सुखावहः ॥८७॥ इति शक्तिदप्रासादः ॥३४॥ कुमुदप्रासाद के प्ररथ के ऊपर एक २ तिलक अधिक बढ़ाने से शक्तिद नाम का प्रासाद होता है । वह लक्ष्मीदेवी को सुखकारक है ॥८७॥ शृंगसंख्या—पूर्ववत् ६५ और तिलक-कोणे ४, प्ररथे १६, नन्दी पर ८ कुल २८ । प्रा० २६