भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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२०२ प्रसादमण्डने ३५-हर्षणप्रासाद— कर्णोर्ध्वे भृङ्गं दातव्यं प्रासादो हर्षणस्तथा । इति हर्षणप्रासादः ॥३५॥ शक्तिद प्रासाद के कोणो के ऊपर एक २ शृंग अधिक चढ़ाने से हर्षण नामका प्रासाद होता है । शृंगसंख्या—कोणो २४, प्र रथे ४०, भद्रे ४, एक शिखर, कुल ६९ शृंग । तिलक पूर्ववत् २८ । ३६-भूषणप्रासाद— कर्णोर्ध्वे तिलकं दद्यात् प्रासादो भूषणस्तथा ॥८८॥ इति भूषणप्रासादः ॥३६॥ हर्षणप्रासाद के कोणो के ऊपर एक तिलक अधिक चढावे तो भूषण नामका प्रासाद होता है ॥८८॥ शृंगसंख्या—पूर्ववत् ६९ और तिलक ३२ । विभक्ति अठारहवीं । ३७-अरनाथजिनवल्लभ-कमलकन्दप्रासाद— चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे चाष्टभागविभाजिते । कर्णो द्विभागिको ज्ञेयो भद्रार्धं च द्विभागिकम् ॥८९॥ कर्णो च शृङ्गमेकं तु केसरीं च निधीयते । भद्रे चैवोद्गमः कार्यो जिनेन्द्रे चारनाथके ॥९०॥ इति त्वं विद्धि भो वत्स ! प्रासादो जिनवल्लभः । कमलकन्दनामोऽयं जिनशासनमार्गतः ॥९१॥ इति अरनाथजिनवल्लभः कमलकन्दप्रासादः ॥३७॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका आठ भाग करें। उनमें दो भाग का कोण और दो भाग का भद्रार्ध बनावें । कोणो के ऊपर एक २ केसरी शृंग चढ़ावें और भद्र के ऊपर उद्गम बनावें । ऐसा अरनाथ जिन के लिये कमलकन्द नाम का प्रासाद हे वत्स ! तूं जान ॥८९ से ९१॥ शृङ्गसंख्या—कोणो २०, एक शिखर, कुल २१ शृंग ।