प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
पृष्ठ 247, कुल 278 में से
संदर्भ में पढ़ें१६८ प्रासादमण्डने कर्णिकायां च द्वे शृङ्गे प्रासादो जिनवल्लभः । मुक्तिदो नाम विज्ञेयो भुक्तिमुक्तिप्रदायकः ॥६६॥ इति मुक्तिदप्रासादः ॥२६॥ विमलजिनवल्लभ नाम के प्रतिरथ ऊपर एक एक तिलक और दोनों नंदीयों के ऊपर कूट के बदले शृंग चढावे । जिससे मुक्तिद नामका प्रासाद होता है, यह जिनदेव को प्रिय है और वैभवादि भोगसामग्री और मुक्ति को देने वाला है ॥६६॥ शृंग संख्या—कोणे १२, प्रतिरथे १६, कोणो पर १६, नंदी पर १६, भद्रे १६, प्रत्यंग ८, एक शिखर, कुल ८५, शृंग और तिलक ८ प्रतिरथ पर । विभक्ति चौदहवीं । २७-अनन्तजिनप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे विंशतिपदभाजिते । त्रीणि त्रीणि ततस्त्रीणि नन्दी पदेति भद्रके ॥७०॥ निर्गमं पदमानेन त्रिषु स्थानेषु भद्रके । कर्णे क्रमत्रयं कार्यं रथोर्ध्वे तत्समं भवेत् ॥७१॥ भद्रे चैवोरुचत्वारि नन्दिकायां क्रमद्वयम् । अनन्तजिनप्रासादो धनपुण्यश्रियं लभेत् ॥७२॥ इत्यनन्तजिनप्रासादः ॥२७॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बीस भाग करें । उनमे तीन भाग का कोना, तीन भाग का उपरथ, तीन भाग का भद्रार्ध और भद्रनन्दी एक भाग जानें । इन अंगों का निकाला एक भाग का रक्खे । कोण और रथ ऊपर तीन तीन क्रम, भद्र के ऊपर चार उरुशृंग और भद्र नन्दी के ऊपर दो क्रम चढ़ावे । ऐसा अनन्तजिनप्रासाद धन, पुण्य और लक्ष्मी को देने वाला है ॥७० से ७२॥ शृंग संख्या--कोणे १०८, प्ररथे २१६, नंदी पर ११२, भद्रे १६, एक सिखर, कुल ४५३ शृंग । २८-सुरेन्द्रप्रासाद— अनन्तस्य सस्थाने रथोर्ध्वे तिलकं न्यसेत् । सुरेन्द्रो नाम विज्ञेयः सर्वदेवेषु वल्लभः ॥७३॥ इति सुरेन्द्रनामप्रासादः ॥२८॥