प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
पृष्ठ 246, कुल 278 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६७ रत्नसंजयप्रासाद के भद्र के ऊपर चौथा एक उरुशृंग अधिक चढाने से धर्मद नामका प्रासाद होता है, वह नगर मे धर्म को बढाने वाला है ॥६३॥ शृंगसंख्या-कोणे १०८ प्रतिरथे ११२, कोणी पर ८, नंदी पर ८, भद्रे १६ प्रत्यंग ८, एक शिखर कुल २६१ शृंग । तिलक पूर्ववत् २० । विभक्ति तेरहवीं । २५-विमलवलभप्रासाद— चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुर्विंशतिभाजिते । पदेन त्रयभागेन कर्णस्तत्र विधीयते ॥६४॥ तद्वज्ज्ञेयः प्रतिकर्णः कोणिका नन्दिका पदा । भद्रार्धं तु चतुर्भागं निर्गमं भागमेव च ॥६५॥ समनिर्गमं रथं ज्ञेयं कर्तव्यं चतुरो दिशि । कर्णे शृङ्गद्वयं कार्यं प्रतिकर्णे १द्वयमेव च ॥६६॥ नन्दिका कोणिकायां च शृङ्गकूटं सुशोभितम् । भद्रे चैवोरुचत्वारि चाष्टौ प्रत्यङ्गानि च ॥६७॥ विमलवलभनामोऽयं प्रासादो विमलप्रियः । इति विमलजिनवल्लभप्रासादः ॥२१॥ समचोरस भूमि का चौबीस भाग करे । उन मे तीन भाग का कोण, तीन भाग का प्रतिकर्ण, कोणिका और नदिका एक एक भाग, और चार भाग का भद्रार्ध बनावें । भद्र का निर्गम एक भाग रखें । रथ और कर्ण का निर्गम समदल रखे । कोणे के ऊपर तीन शृंग, प्रतिकर्ण के ऊपर दो शृंग, नदिका और कोणिका के ऊपर एक एक शृंग और एक एक कूट, भद्र के ऊपर चार उरुशृंग और आठ प्रत्यंग चढावे । यह विमलजिनवल्लभ नामका प्रासाद विमलजिन को प्रिय है ॥६४ से ६७॥ शृंगसंख्या-कोणे १२, प्रतिरथे १६, कोणी पर ८, नंदी पर ८, भद्रे १६, प्रत्यंग ८, एक शिखर कुल ६६ शृंग । कूट १६ । २६-मुक्तिदप्रासाद— तद्रूपे च प्रकर्त्तव्यो रथे तिलकं दापयेत् ॥६८॥ १. 'तथैव च ।'