प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः १३ शङ्कोर्नेत्रगुणे तु मण्डलवरे छायाद्वयान्मत्स्ययो- र्जाता यत्र युतिस्तु शङ्कु तलतो याम्योत्तरे स्त* स्फुटे ॥'* राज० अ० १ श्लो० ११ रात्रि में दिक् साधन— सप्तर्षि और ध्रुव के बीच मे एक गज के अन्तर वाले दो तारा है जो ध्रुव के चारो तरफ घूमते है उनको मर्कटिका कहते है। यह मर्कटिका और ध्रुव जब बराबर समसूत्र मे आवे, तब एक अवलम्ब लटकावे और उसके सामने दक्षिण की तरफ एक दीपक रखें । यदि दीपक का अग्र भाग, अवलंब और ध्रुव ये तीनो बराबर समसूत्र में दिखाई पड़े तो उसे उत्तर दिशा आने । अवलंब और दीपक के समसूत्र एक रेखा खींची जाय तो वह उत्तर दक्षिण रेखा होगी * । दिन मे दिक्साधन करना हो तो समतल भूमि के ऊपर बत्तीस अंगुल का एक गोल चक्र बनावें, उसके मध्य बिन्दु पर एक बारह अंगुल के नाप का शंकु रखें । पश्चात् दिन के पूर्वार्ध मे देखे कि शंकुकी छाया गोल मे जिस जगह प्रवेश करे, वहां एक चिह्न करे वह पश्चिम दिशा होगी और दिन के उत्तरार्ध में जहां बाहर निकले वहा एक बिन्दु करे यह पूर्व दिशा होगी । पीछे पूर्व और पश्चिम की इन दोनो बिन्दुओ तक एक सरल रेखा खीची जाय तो यह पूर्व पश्चिम रेखा होगी, इसको व्यासार्ध मान करके दो गोल बनावें, जिसे एक मत्स्य के जैसी आकृति होगी, उसके ऊपर और नीचे के योग बिन्दु से एक सरल रेखा खीची जाय तो यह उत्तर दक्षिण रेखा होगी । देखो नीचे का दिक्साधन चक्र— चक्र परिचय— बत्तीस अंगुल का 'इ उ ए' एक गोल है, उसका मध्य बिन्दु 'अ' है । उसके ऊपर बारह अंगुल का एक शंकु रखकर दिन के पूर्वार्द्ध में देखा गया तो शंकुकी छाया गोल के 'क' बिन्दु के पास प्रवेश करती है, यह पश्चिम दिशा जाने और दिनार्द्ध के बाद 'च' बिन्दु के पास बाहर निकलती है, यह पूर्व दिशा जाने । इन 'क' और 'च' दोनों बिन्दु तक एक सरल रेखा खीची जाय तो यह पूर्व पश्चिम रेखा होती है । इसको व्यासार्द्ध मान कर 'क' बिन्दु से 'च छ ज' और दूसरा 'च' बिन्दु से 'क ख ग' ऐसे दो गोल बनावे तो पूर्व पश्चिम रेखा के ऊपर एक मछली के जैसी आकृति हो जाती है। उसके मध्य बिन्दु 'अ' से एक सरल रेखा खीची जाय जो गोलके दोनो स्पर्श बिन्दु से बाहर निकल जाय, यह उत्तर दक्षिण रेखा होती है ।
- उपरोक्त प्रकार से भी वास्तविक दिशा का ज्ञान नहीं होता, क्योकि अयनाश के कारण ध्रुव का तारा एव कृत्तिकादि नक्षत्र ठीक दिशा मे उदय नहीं होता । जिसे आजकल नवीन आविष्कार दिक् साधन यन्त्र (कुतुबनुमा) से करना चाहिये ।