भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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१४ प्रासादमण्डने खात विधि— नागवास्तुं समालोक्य कुर्यात् खातविधिं¹ सुधीः । पाषाणान्तं जलान्तं वा ततः कूर्मं निवेशयेत् ॥२४॥ प्रथम शेषनाग चक्र का विचार करके विद्वान् शिल्पी खात विधि करें। नींव को खोदने से भूमि में पाषाण अथवा पानी निकल जाय, उसके ऊपर कूर्म (कच्छुआ) की स्थापना करें ॥२४॥ नागवास्तु— “कन्यादौ रवितस्त्रये फणीमुखं पूर्वादि सृष्टिकमात्” ऐसा राजवल्लभ मण्डन के अध्याय प्रथम श्लोक २२ मे कहा है कि— कन्या, तुला और वृश्चिक राशि का सूर्य हो तब शेषनाग का मुख पूर्व दिशा मे; धन, मकर कुम्भ राशि का सूर्य हो तब दक्षिण दिशा मे; मीन, मेष और वृष राशि का सूर्य हो तब पश्चिम दिशा मे, मिथुन कर्क और सिंह राशि का सूर्य हो तब उत्तर मे शेषनाग का मुख रहता है। “पूर्वास्येऽनिलखातनं यममुखे खातं शिवे कारये- च्छीर्षे पश्चिमगे च वह्नि खननं सौम्ये खनेन्नैर्ऋते।।” ऐसा राजवल्लभ मण्डन के अध्याय प्रथम श्लोक २४ में कहा है कि-शेषनाग का मुख पूर्व दिशा मे हो तो वायुकोण में, दक्षिण दिशा मे हो तो ईशानकोण मे, पश्चिम दिशा मे हो तो अग्निकोण में और उत्तर दिशा मे हो तो नैर्ऋत्य कोण मे खात करना चाहिये। (१) वास्तुविधि