प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः १७ एक हाथ के प्रासाद मे कूर्म आधा अंगुल का, दोसे पंद्रह हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ आधा २ अगुल बढा करके, सोलह से एकतीस हाथ के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ पाव २ अंगुल बढ़ा करके, और बत्तीस से पचास हाथ के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ एक २ सूत बढा करके बनावे। इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद मे एक सूत कम चौदह अंगुल के मान का कूर्म होता है। क्षीरार्णव के मत से कूर्ममान-- “शिलायाः पञ्चमांशेन कर्तव्यं कूर्ममुत्तमम् । सर्वालङ्कारसंयुक्तं दिव्यपुष्पैश्च पूजितम् ॥” अध्याय १०१ धारणी शिला के पाचवे भाग का कूर्म बनावे, यह उत्तम मान है। उसको सब प्रकार के अलंकारों से युक्त करे और सुगंधित पुष्पो से पूजित करे । कूर्म का ज्येष्ठ और कनिष्ठ मान— चतुर्थांशाधिको ज्येष्ठः कनिष्ठो हीनयोगतः । सौवर्णो रूप्यजो वापि स्नाप्यः पञ्चामृतेन स ॥२७॥ तिलैर्यवैस्तथा होम-पूर्णां चैव प्रदापयेत् । कूर्मका जो मान आया हो, वह मध्यम मान है, उसमे इस मान का चौथा भाग बढ़ावे तो ज्येष्ठ मानका और चौथा भाग कम करे तो कनिष्ठ मानका कूर्म होता है। यह कूर्म सुवर्ण अथवा चांदी का बनाना चाहिये । उसको पञ्चामृत से स्नान कराके, तथा तिल और जवो का पूर्णा आहुति पूर्वक होम करके स्थापित करे ॥२७॥ शिला और कूर्म का स्थापन क्रम— ईशानादग्निकोणाद्वा शिलाः स्थाप्याः प्रदक्षिणाः ॥२८॥ मध्ये कूर्मशीला पश्चाद् गीतवादित्रमङ्गलैः । बलिदानं च नैवेद्यं विविधाम्नं घृतप्लुतम् ॥ देवताभ्यः सुधीर्दद्यात् कूर्मन्यासे शिलासु च ॥२६॥ इति कूर्म स्थापनम् । प्रथम ईशान अथवा अग्नि कोने मे नंदा शिला की स्थापना करके पीछे प्रदक्षिण क्रम से अन्य शिलाओ को स्थापित करे। पीछे मध्य मे कूर्म शिला (धारणी शिला) को स्थापित करे । शिला स्थापन करते समय मांगलिक गीत और वाजींत्रों का नाद करावे। वास्तु के देवों को बलि बाकुले, नैवेद्य और अनेक प्रकार के धान्य के घृत से पूर्ण मालपूवे आदि चढावें ॥२८-२९॥ प्रा० ३