भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 278 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 55

१८ प्रासादमण्डने पुनः शिला स्थापन क्रम— “नन्दां पुरः प्रदातव्यां शिलाः शेषाः प्रदक्षिणो । मध्ये च धरणी स्थाप्या यथाक्रमं प्रयत्नतः ॥” क्षीरार्णवे अध्य० १०१ प्रथम नन्दा नाम की शिला को स्थापित करे, पीछे अनुक्रम से भद्रा आदि शिलाओं को प्रदक्षिण क्रम से स्थापित करे और मध्य मे धरणी शिला को स्थापन करे। ऐसा क्षीरार्णव ग्रंथ मे कहा है। शिला के नाम— ‘'नन्दा भद्रा जया रिक्ता अजिता चापराजिता । शुक्ला सौभाग्यिनी चैव धरणी नवमी शिला ॥” क्षीरार्णवे अ० १०१ नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता, अजिता, अपराजिता, शुक्ला और सौभाग्यिनी ये अनुक्रम से दिशाओं की आठ शिलाओ के नाम है। नवमी धरणी नाम की शिला मध्य भाग की है। अपराजित मत से शिला के नाम— “नन्दा भद्रा जया पूर्णा विजया पञ्चमी शिला मङ्गला ह्यजितापरा-जिता च धरणीभवाः ॥” नन्दा, भद्रा, जया, पूर्णा, विजया, मंगला, अजिता, अपराजिता, ये अनुक्रम से दिशाओं को शिला के नाम है और मध्य भाग की नववी धरणी नाम की शिला है। धरणी शिला का मान— “एक हस्ते तु प्रासादे शिला वेदाङ्गुला भवेत् । द्वयङ्गुला च भवेद् वृद्धिर्य्यावच्च दशहस्तकम् ॥ दशोर्ध्वं विंशपर्यन्तं हस्ते हस्ते चैकाङ्गुला । अर्द्धाङ्गुला भवेद् वृद्धिर्य्यावत्पञ्चाशद्धस्तकम् ॥ तृतीयांशे कृते पिण्डे तदर्धं रूपपातकम् । पुष्पाणि च यथाकारं शिलामध्ये ह्यलंकृतम् ॥” क्षीरार्णवे अ० १०१ एक हाथ के प्रासाद मे चार अंगुल की शिला, दोसे दस हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ दो २ अगुल वढा करके, ग्यारह से बीस हाथ तक के प्रासाद में एक एक अंगुल बढ़ा करके, और इक्कीस से पचास हाथ तक के प्रासाद मे आधा २ अंगुल बढा करके स्थापित करे । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद मे ४७ अंगुल के मान की समचोरस धरणी शिला होती है।