प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
पृष्ठ 65, कुल 278 में से
संदर्भ में पढ़ेंएक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की जगती एक हाथ, दो-हाथ के प्रासाद की जगती डेढ़ हाथ, तीन हाथ के प्रासाद की जगती दो हाथ, चार हाथ के प्रासाद की जगती ढाई हाथ ऊंची बनावे। पीछे पाँच से बारह हाथ तक के प्रासाद की जगती दूसरे भाग की अर्थात् प्रासाद से आधी, तेरह से चौबीस हाथ के प्रासाद की जगती तीसरे भाग और पचीस से पचास हाथ तक के प्रासाद की जगती चौथे भाग जितनी ऊंची बनावें ॥१०॥ (यह अपराजितपृच्छा का मत है। देखें सूत्र ११५ श्लोक २३ से २६) जगती के उदय का थर मान— तदुच्छ्रयं भजेत् प्राज्ञ-स्त्वष्टाविंशतिभिः पदैः । त्रिपदो जाड्यकुम्भश्च द्विपदं कर्णकं तथा ॥११॥ पद्मपत्रसमायुक्ता त्रिपदा शिरःपत्रिका¹ । द्विपदं खुरकं कुर्यात् सप्तभागं च कुम्भकम् ॥१२॥ कलशस्त्रिपदः प्रोक्तो भागेनान्तरपत्रकम् । कपोतालिस्त्रिभागा च पुष्पकण्ठो युगांशकः ॥१३॥ पुष्पकाज्जाड्यकुम्भस्य निर्गमश्चाष्टभिः पदैः । कर्णेषु च दिशांपालाः प्राच्यादिषु प्रदक्षिणाः ॥१४॥ जगती के उदय के अट्ठाईस भाग करे। उनमे से तीन भाग का जाड्यकुम्भ, दो की कर्णिका (कणी), तीन भाग का पद्मपत्र (दासा) सहित ग्रासपट्टी, दो भाग का खुरा, सात भाग का कुम्भ, तीन भाग का कलश, एक भाग का अंतरपत्र, तीन भाग की कपोताली (केवाल) और चार भाग का पुष्पकंठ बनावे। पुष्पकंठ से जाड्यकुम्भ का निर्गम आठ भाग रक्खे। जगती के कोने में पूर्वादि सृष्टि क्रम से दिक्पालों को स्थापित करना चाहिये ॥११ से १४॥ जगती के आभूषण— प्राकारैर्मण्डिता कार्या चतुर्भिर्द्वारमण्डपैः । मकरैर्जलनिष्कासैः सोपानैस्तोरणादिभिः ॥१५॥ जगती को किलों से शोभायमान करें, अर्थात् जगती के चारो तरफ किला बनावें । तथा चारों दिशाओं में मण्डप वाले चार द्वार बनावे। पानी निकलने के लिये मगर के मुख वाली नाली रक्खे। एवं सीढ़ियां और तोरणों से शोभायमान जगती बनायें ॥१५॥ (१) शीर्षपत्रिका ।