प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्याय ३७ भ्रमणी (परिक्रमा)— त्रिद्व्येकभ्रमसंयुक्ता ज्येष्ठा मध्या कनिष्ठिका¹ । उच्छ्रायस्य त्रिभागेन भ्रमणीनां समुच्छ्रयः ॥७॥ जगती मे तीन भ्रमणी (परिक्रमा) हो तो ज्येष्ठा, दो भ्रमणी हो तो मध्यमा और एक भ्रमणी हो तो कनिष्ठा जगती कहा जाता है। यह भ्रमणी की ऊंचाई जगती की ऊंचाई के तीसरे २ भाग की होनी चाहिये ॥७॥ "कनिष्ठे भ्रमणी चैका मध्यमे भ्रमणीद्वयम् । ज्येष्ठे तिस्रो भ्रमण्यश्च साङ्गोपाङ्गिकसङ्ख्यया ॥" अप० सूत्र० ११५ कनिष्ठ प्रासाद हो तो एक भ्रमणी, मध्यम प्रासाद हो तो दो भ्रमणी, और ज्येष्ठ प्रासाद हो तो तीन भ्रमणी अपने अंगोपांग वाली बनानी चाहिये । जगती के कोने— चतुष्कोणैस्तथा सूर्य-कोणैर्विंशतिकोणकैः । अष्टाविंशति-षट्त्रिंशत्-कोणैः स्युः पञ्च फालनाः ॥८॥ चार कोने वाली, बारह कोने वाली, बीस कोने वाली, अट्ठाईस कोने वाली और छत्तीस कोने वाली, ये पांच प्रकार के कोने वाली जगती है ॥८॥ जगती की ऊंचाई का मान— प्रासादाद्धार्कहस्तान्ते त्र्यंशा द्वाविंशतिकरे । द्वात्रिंशे चतुर्थांशा भूतांशोच्चा शताद्धके ॥६॥ एक से बारह हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की जगती प्रासाद के अर्ध भाग की ऊंची बनावें। तेरह से बाईस हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की जगती प्रासाद के तीसरे भाग की, तेईस से बत्तीस हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की जगती चौथे भाग की, और तैंतीस से पचास हाथ के प्रासाद की जगती पांचवे भाग की ऊंची बनानी चाहिये ॥६॥ पुनः— एकहस्ते करेणोच्चा सार्द्ध द्वयंशाश्चतुष्करे । सूर्यजैनशताद्धान्तं क्रमाद् द्वित्रियुगांशकैः ॥१०॥ (१) 'कनीयसी' ।