भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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२६ प्रासादमण्डने अपराजितपृच्छा सू० ११५ में भी कहा है कि— "प्रासादपृथुमानेन द्वि ( त्रि ? ) गुणा चोत्तमा तथा । मध्यमा चतुर्गुणा ' याधमा पञ्चगुणोच्यते ॥" प्रासाद के विस्तार से दुगुनी हो तो उत्तम, चार गुनी हो तो मध्यम और पांच गुनी हो तो कनिष्ठ मान की जगती कही जाती है । कनिष्ठे¹ ज्येष्ठा कनिष्ठां ज्येष्ठे मध्ये च मध्यमा । प्रासादे जगती कार्या स्वरूपा लक्षणान्विता ॥४॥ कनिष्ठ मान के प्रासाद में ज्येष्ठमान की जगती, मध्यम मान के प्रासाद में मध्यम मान की. और ज्येष्ठमान के प्रासाद में कनिष्ठ मान की जगती प्रासाद के स्वरूप के लक्षण वाली बनानी । अर्थात् जिस आकार का प्रासाद हो, उसी आकार की जगती बनानी चाहिये ॥४॥ अपराजितपृच्छा में भी लिखा है कि— “ज्येष्ठा कनिष्ठप्रासादे मध्यमे मध्यमा तथा । ज्येष्ठे कनिष्ठा व्याख्याता जगती मानसंख्यया ॥" सूत्र० ११५ कनिष्ठमान के प्रासाद में ज्येष्ठमान की, मध्यममान के प्रासाद में मध्यममान की और ज्येष्ठमान के प्रासाद में कनिष्ठ मान की जगती रखनी चाहिये । रससप्तगुणाख्याता जिने पर्यायसंस्थिते । द्वारिकायां च कर्त्तव्या तथैव पुरुषत्रये ॥५॥ पंच कल्याणक ( च्यवन, जन्म, दीक्षा, ज्ञान और मोक्ष ) वाले अथवा देवकुलिका वाले जिन प्रासाद में, द्वारिका प्रासाद में और त्रिपुरुष ( ब्रह्मा, विष्णु और शिव ) के प्रासाद में छहगुणी अथवा सातगुणी जगती रखनी चाहिये ॥५॥ मण्डप की जगती— मण्डपानुक्रमेणैव सपादांशेन सार्धतः । द्विगुणा चायता कार्या सहस्रायतने² विधिः ॥६॥ मंडप के अनुक्रम से सवायी, डेढ़ी अथवा दुगुनी लंबी जगती करनी चाहिये । हजारों प्रासादों में यही विधि है ॥६॥ (१) कन्यसे कन्यसा ज्येष्ठा", मुद्रित पुस्तकद्वये । (२) 'स्वहस्तायतने' ।

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