भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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अथ प्रासादमण्डने द्वितीयोऽध्यायः जगती— विश्वकर्मोवाच— प्रासादानामधिष्ठानं जगती सा निगद्यते । यथा सिंहासनं राज्ञः प्रासादस्य तथैव सा ॥१॥ प्रासाद की मर्यादित भूमि को जगती कहते है। जैसे—राजा का सिंहासन रखने के लिये अमुक स्थान मर्यादित रखा जाता है, वैसे प्रासाद बनाने के लिये अमुक भूमि मर्यादित रक्खी जाती है ॥१॥ अपराजितपृच्छा के सूत्र ११५ मे श्लोक ५ मे लिखा है कि— "प्रासादो लिङ्गमृत्युक्तो जगती पीठमेव च ॥” प्रासाद शिवलिङ्गका स्वरूप है। जैसे शिवलिङ्ग के चारों तरफ पीठिका है, वैसे ही प्रासाद के जगतीरूप पीठिका है । जगती का आकार— चतुरस्रायताष्टास्रा वृत्ता वृत्तायता तथा । जगती पञ्चधा प्रोक्ता प्रासादस्यानुरूपतः ॥२॥ समचोरसं, लंब चौरस, आठ कोने वाली, गोल और लंब गोल, ऐसे पांच आकार वाली जगती है । उनमे से प्रासाद का जैसा आकार हो, वैसी जगती बनानी चाहिये ॥२॥ जगती का विस्तार मान— प्रासादपृथुमानाच्च त्रिगुणा च चतुर्गुणा । क्रमात् पञ्चगुणा प्रोक्ता ज्येष्ठा मध्या कनिष्ठिका ॥३॥ प्रासाद के विस्तार के मान से तीन गुणी, चार गुणी अथवा पांच गुणी जगती बनानी चाहिये । उनमें तीनगुणी ज्येष्ठमान की, चार गुणी मध्यममान की और पांच गुणी कनिष्ठ- मान की जगती समझनी चाहिये ॥३॥ प्रा० ४