प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ : प्रासादमण्डने मण्डपाग्रे प्रतोल्यग्रे सोपानं शुण्डिकाकृतिम् । तोरणं कारयेत्¹ तस्य पदपदानुसारतः² ॥१६॥ मण्डप के आगे और प्रतोली (पोले) के आगे सीढियाँ बनावें, इसके दोनों तरफ हाथी की आकृति रक्खे। प्रत्येक पद के अनुसार तोरण बनावे ॥१६॥ तोरणस्योभयस्तम्भ-विस्तारं गर्भमानतः । भित्तिगर्भप्रमाणेन सम्मानेन³ वा भवेत् ॥१७॥ - तोरण के दोनों स्तंभ के मध्य का विस्तार प्रासाद के गर्भगृह के मान से, अथवा दीवार के गर्भमान से, अथवा प्रासाद के मान से रखा जाता है ॥१७॥ वेदिका पीठरूपा च शोभाभिर्बहुभिर्युता । विचित्रं तोरणं कुर्याद् दोला देवस्य तत्र च ॥१८॥ यह जगतीरूप वेदिका प्रासाद की पीठरूप है, इसलिये इसे अनेक प्रकार के रूपों तथा तोरणों से शोभायमान बनाना चाहिये। तोरणों के झूलों में देवों की आकृतियां बनावें ॥१८॥ देवके वाहन का स्थान-- प्रासादाद्वाहनस्थाने करणीया चतुष्किका । एकद्वित्रिचतुःपञ्च-रससप्तपदान्तरे ॥१९॥ देवों के वाहन रहने के स्थान पर चौकी बनावें। यह चौकी प्रासाद से एक, दो, तीन, चार, पाच, छह अथवा सात पद जितनी दूर बनावें ॥१९॥ देवके वाहन का उदय-- अर्चायामे⁴ नवांशे तु पञ्चषट्सप्त भागिकः । गुह्यनाभिस्तनान्तं वा त्रिविधो वाहनोदयः ॥२०॥ मूर्त्ति के उदय का नव भाग करे। उनमे से पांच, छह अथवा सात भाग के मान का वाहन का उदय रख। अथवा गुह्य, नाभि या स्तन पर्यन्त वाहन का उदय रक्खे। ये तीन २ प्रकार के वाहन का उदय कहा गया है ॥२०॥ (१) 'त्रिविध कुर्यात्' (२) 'पट्ट पट्टानुसारतः'। (३) 'तयोर्मध्येऽथवा भवेत्'। (४) 'अर्चाया नवमांशे तु,'