प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्याय ३१ देवके वाहन का दृष्टिस्थान— पादं जानु कटिं याव-दर्चाया वाहनस्य दृक् । वृषस्य विष्णुभागान्ते सूर्ये व्योमस्तनान्तकम् ॥२१॥ मूत्ति के चरण, जानु अथवा कमर पर्यन्त ऊंचाई में वाहन की दृष्टि रखनी चाहिये । वृषभ (नन्दी) की दृष्टि शिवलिंग के विष्णु भाग तक और सूर्य के वाहन (घोडा) की दृष्टि मूत्ति के स्तनभाग तक रखनी चाहिये ॥२१॥ अपराजितपृच्छा में कहा है कि— "वृषस्य चोच्छ्रयः कार्यो विष्णुभागान्तदृष्टिकः ॥- पादं जानु कटिं याव-दर्चाया वाहनस्य दृक् । गुह्यनाभिस्तनान्तं वा सूर्ये व्योमस्तनान्तिकम् ॥ विलोमे कुरुते पीडा-मधोदृष्टिः सुखक्षयम् । स्थानं हन्यादूर्ध्वदृष्टिः स्वस्थाने मुक्तिदायिकां ॥" सूत्र० २०८ वृषभ की ऊंचाई शिवलिंग के विष्णुभाग तक दृष्टि रहे, इस प्रकार रखे । देवो के वाहन की दृष्टि उनके चरण, जानु अथवा कटि तक रहे तथा गुह्य नाभि और स्तन तक दृष्टि रहे, इस प्रकार ऊंचाई रखे । इससे विपरीत रखने से दुख होवेगा । उपरोक्त मान से नीची दृष्टि रहने पर सुख का क्षय होगा और यदि ऊंची दृष्टि ही रहेगी, तो, स्थान भ्रष्ट होगा । इसलिये कहे हुए अपने २ स्थान मे दृष्टि रखने से मुक्तिपद मिलता है। जिन प्रासाद के मंडपों का क्रम— जिनाग्रे समोसरणं शुकाग्रे गूढमण्डपः । गूढस्याग्रे¹ चतुष्किा तदग्रे नृत्यमण्डपः ॥२२॥ जिन प्रासाद के आगे समवसरण बनाना । शुकनास (कंवलीमण्डप) के आगे गूढ मण्डप, इसके आगे चौकी मंडप और इसके आगे नृत्यमडप बनाने चाहिये ॥२२॥ जिनप्रासाद में देवकुलिकाका क्रम— द्विसप्तत्या द्विषष्टौर्वा चतुर्विंशतितोऽपि वा । जिनालये चतुर्दिक्षु सहितं जिनमन्दिरम् ॥२३॥ ऐसा जिनमन्दिर बनाना चाहिये की जिनप्रासाद के चारो तरफ बहत्तर, बावन अथवा चौबीस देवकुलिकाये हो ॥२३॥ (१) 'तस्याग्रे षट्त्रिका वा च' ।