भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 278 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 69

३२ प्रासादमण्डने परमजैन ठक्कुर 'फेरूं' विरचित वत्थुसारपयरण के तीसरे प्रकरण में देवकुलिका का क्रम बतलाया है। जैसे- बावन जिनालय- "चउतीसं वाम दाहिण नव पुट्ठि अट्ठ पुरओ अ देहरयं । मूलपासाय एगं; बावन्नजिनालये एवं ॥" जिनप्रासाद के बायीं और दाहिनी ओर सत्रह २, पीछे के भाग में नौ और आगे आठ, ऐसे इकावन देवकुलिका और एक मुख्य प्रासाद मिलकर कुल बावन जिनालय कहा जाता है। बहत्तर देवकुलिका- "पणवीसं पणवीसं दाहिणवामेसु पिट्ठि इग्गारं । दह अग्गे नायव्वं इअ बंहत्तरि जिणिदालं ॥" जिनप्रासाद के बांयी और दाहिनी ओर पच्चीस २, पीछे की तरफ ग्यारह और आगे की तरफ दस, ऐसे इकहत्तर देवकुलिका और एक मुख्य प्रासाद मिलकर कुल बहत्तर जिनालय कहा जाता है। चौबीस देवकुलिका- "अग्गे दाहिण वामे अट्ठट्ठजिणिदगेह चउवीसं । मूलसिलागाउ कमं पकीरए जगइ-मज्झम्मि ॥" मुख्य जिनप्रासाद के आगे, दाहिनी और बायी ओर, ऐसे तीन दिशा में आठ २ देवकुलिका बनाने से कुल चौबीस जिनालय कहा जाता है। ये सब देवकुलिकाएं जगती के प्रान्त (सरहद) भाग मे की जाती है। मण्डपाद् गर्भसूत्रेण वामदक्षिणयोर्दिशोः । अष्टापदं प्रकर्त्तव्यं त्रिशाला वा बलाणकम् ॥२४॥ मुख्य जिनप्रासाद के गूढ मंडप की बायीं और दाहिनी ओर अष्टापद, त्रिशाला अथवा वलाणक बनावे। (सामने भी बलाणक बनाया जाता है) ॥२४॥ रथ और मठ का स्थान- अपरे रथशाला च मठं याम्ये प्रतिष्ठितम् । उत्तरे रथरन्ध्रं च प्रोक्तं श्रीविश्वकर्मणा ॥२५॥ देवालय के पीछे की तरफ रथशाला, दक्षिण मे मठ (धर्मगुरु का स्थान) और उत्तर मे रथ का प्रवेश द्वार बनावें। ऐसा विश्वकर्मा ने कहा है ॥२५॥