प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्याय ३३ जगती तादृशी कार्या प्रासादो यादृशो भवेत् । भिन्नच्छन्दा न कर्त्तव्या प्रासादासनसंस्थिता ॥२६॥ इति प्रासादजगती । प्रासाद जिस आकार का हो, उसी आकार की जगती बनानी चाहिये । भिन्न आकार की नहीं बनानी चाहिये । क्योंकि यह प्रासाद का आसनरूप है ॥२६॥ अन्य प्रासाद— अग्रतः पृष्ठतश्चैव वामदक्षिणयोर्दिशोः१ । प्रासादं कारयेदन्यं नाभिवेधविवर्जितम् ॥२७॥ मुख्य प्रासाद के आगे, पीछे, बायी और दाहिनी ओर दूसरे प्रासाद बनाये जाय, वे सब नाभिबेध ( प्रासाद के गर्भ ) को छोड़कर के बनावे ॥२७॥ शिवलिंग के आगे अन्य देव— लिङ्गाग्रे तु न कर्त्तव्या अर्चारूपेण देवताः । प्रभानष्टा न भोगाय यथा तारा दिवाकरे ॥२८॥ शिवलिंग के सामने कोई सी देव पूजन के रूप में स्थापित करना नहीं चाहिये । क्योकि जैसे सूर्य के तेज से ताराओं की प्रभा नष्ट होती है, वैसे दूसरे देवों की प्रभा नष्ट होती है । इसलिये वे देव भोगादि सुख संपत्ति नही दे सकते ॥२८॥ देव के सम्मुख स्वदेव— शिवस्याग्रे शिवं कुर्याद् ब्रह्माणं ब्रह्मणोऽग्रतः । विष्णोरग्रे भवेद् विष्णु-र्जिने२ जिनो रवौ रविः ॥२९॥ शिवके सामने शिव, ब्रह्मा के सामने ब्रह्मा, विष्णु के सामने विष्णु, जिनदेव के सामने जिनदेव और सूर्य के सामने सूर्य, इस प्रकार आपस मे स्वजातीय देव स्थापित किया जाय तो दोष नही माना जाता ॥२९॥ 'चण्डिकाग्रे भवेन्माता यक्षः क्षेत्रादिभैरवः । ज्ञेयास्तेषामभिमुखे ये येषां च हितेषिणः ॥' अप० सू० १०८ चंडिका आदि देवी के सामने मातृदेवता, यक्ष, क्षेत्रपाल और भैरव आदि देव स्थापित किये जायें तो दोष नही है । क्योकि वे आपस मे हितैषी है । (१) 'तोऽपि वा' । (२) जिने जैनो । प्रा० ५