भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

३४ प्रासादमण्डने परस्पर दृष्टिवेध— ब्रह्मा विष्णुरेकनाभि-द्वाभ्यां¹ दोषो न विद्यते । शिवस्याग्रेऽन्यदेवस्य दृष्टिवेधे महद्भयम् ॥३०॥ ब्रह्मा और विष्णु ये दोनो देव एक नाभि मे हों अर्थात् उनका देवालय आपस में सामने हो तो दोष नही है । परंतु शिवके सामने दूसरे देवका दृष्टिवेध होता हो तो बड़ा भय उत्पन्न होता है ॥३०॥ दृष्टिवेध का परिहार— प्रसिद्धराजमार्गस्य प्राकारस्यान्तरेऽपि वा । स्थापयेदन्यदेवांश्च तत्र दोषो न विद्यते ॥३१॥ शिवालय और अन्य देवों के देवालय, इन दोनों के बीच मे प्रसिद्ध राजमार्ग ( आम रास्ता ) हो, अथवा दीवार हो तो दोष नही है ॥३१॥ शिवस्नानोदक— शिवस्नानोदकं गूढ-मार्गे चण्डमुखे क्षिपेत् । दृष्टं न लङ्घयेत्तत्र² हन्ति पुण्यं पुराकृतम् ॥३२॥ शिव का स्नानजल गुप्त मार्ग से चण्डगण के मुख में गिरे, इस प्रकार स्नान का जल निकलने की गुप्त नाली रखना चाहिये । दिखते हुये स्नान जल का उल्लंघन ( लाघना ) नहीं करना चाहिये । क्योकि स्नान जल का उल्लंघन करने से पूर्वकृत पुण्य का नाश होता है ॥३२॥ * चंडगण शिवस्नानोदक पी रहा है (१) जिने । (२) स्नानं ।

  • चंडनाथ गणदेव का स्वरूप अपराजित पृच्छा सूत्र २०८ में लिखा है कि-स्थूल शरीर बाला, भयंकर मुख वाला, ऊर्ध्वासन बैठा हुआ और दोनों हाथ से स्नान जल पीता हुआ, ऐसा स्वरूप बना करके पीठिका के जल स्थान के नीचे स्थापन किया जाता है, जिससे स्नान का जल उसके मुख में होकर बाहर गिरे । इस स्नान जल के उच्छिष्ट होजाने पर उसका यदि कभी उल्लंघन हो जाय तो दोष नही माना जाता, ऐसा शिल्पियो का कहना है ।