भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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द्वितीयोऽध्यायः ३५ देवों की प्रदक्षिणा— एका चण्ड्या रवौ सप्त तिस्रो दद्याद् विनायके । चतस्रो वासुदेवस्य¹ शिवस्यार्धा प्रदक्षिणा ॥३३॥ चंडीदेवी को एक, सूर्य को सात, गणेश को तीन, विष्णु को चार और महादेव को आधी प्रदक्षिणा देनी चाहिये ॥३३॥ अग्रतो जिनदेवस्य स्तोत्रमन्त्रार्चनादिकम् । कुर्यान्न दर्शयेत् पृष्ठं सम्मुखं द्वारलङ्घनम् ॥३४॥ जिनदेव के आगे स्तोत्र, मंत्र और पूजन आदि करे । परंतु बाहर निकलते समय अपनी पीठ नही दिखावे, सम्मुख ही पिछले पैर चलकर द्वार का उल्लंघन करे ॥३४॥ जलमार्ग (पनाला)— पूर्वापरमुखे द्वारे प्रणालं शुभमुत्तरे । इति शास्त्रविचारोऽय-मुत्तरास्या² न देवताः ॥३५॥ पूर्व और पश्चिम दिशा के द्वार वाले प्रासाद की नाली (पनाला) उत्तर दिशा मे रखना शुभ है । उत्तर दिशा में (दक्षिणाभिमुख) किसी भी देव की स्थापना नही करे ऐसा शास्त्र का नियम है ॥३५॥ अपराजितपृच्छा में लिखा है कि— “पूर्वापरं यदा द्वारं प्रणालं चोत्तरे शुभम् । प्रशस्तं शिवलिङ्गाना-मिति शास्त्रार्थनिश्चयः ॥” सूत्र० १०८ पूर्व और पश्चिम दिशा के द्वार वाले प्रासाद की नाली उत्तर दिशा मे रखना शुभ है । शिवलिंग के लिये तो यह नियम विशेष प्रशंसनीय है । ऐसा शास्त्र का नियम है । “अर्चानां मुखपूर्वाणां प्रणाल वामंत. शुभम् । उत्तरास्या न विज्ञेया अर्चािरूपेण देवताः ॥” सूत्र० १०८ यदि देवो का मुख पूर्व दिशा के सामने हो तो उसकी नाली बायी ओर रखना शुभ है । उत्तर दिशा मे दक्षिणाभिमुख किसी भी देव की मूर्त्ति स्थापित नहीं करे । (१) विष्णुदेवस्य । (२) मुत्तरेणा ।