प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ प्रासादमण्डने “जैनमुक्ताः समस्ताश्च याम्योत्तरक्रमैः स्थिताः । वामदक्षिणयोगेन कर्त्तव्यं सर्वकामदम् ॥” अ० सूत्र १०८ जिनदेव के प्रासाद दक्षिण और उत्तर दिशा के द्वार वाले भी बनाये जाते हैं। उनकी नाली वाम दक्षिण योग से अर्थात् दक्षिण दिशा के सामने द्वार वाले अर्थात् दक्षिणाभिमुख प्रासाद को नालो बायीं ओर तथा उत्तर दिशा के सामने द्वार वाले ( उत्तराभिमुख ) प्रासाद की नाली दाहिनी ओर बनावे, अर्थात् उत्तर या दक्षिण दिशा के द्वार वाले प्रासाद की नाली पूर्व दिशा में रक्खे । यह सब इच्छापूर्ण करने वाली है । वास्तुमंजरी से भी कहा है कि— “पूर्वापरास्यप्रासादे नाल सौम्ये प्रकारयेत् । तत्पूर्वे याम्यसौम्यास्ये मण्डपे वामदक्षिणो ॥” पूर्व और पश्चिमाभिमुख प्रासाद की नाली उत्तर दिशा मे, उत्तर और दक्षिणाभिमुख प्रासाद की नाली पूर्व दिशा मे रक्खे । मंडप मे स्थापित किये देवों की नाली बायी ओर दाहिनी ओर रखनी चाहिये । मण्डपस्थित देवों की नाली— मण्डपे ये स्थिता देवा-स्तेषां वामे च दक्षिणे । प्रणालं कारयेद् धीमान् जगत्त्यां च चतुर्दिशम् ॥३६॥ मंडप मे जो देव स्थापित हों, उनके स्नान जल निकलने की नाली बायी और दाहिनी ओर रखना चाहिये, अर्थात् मूलनायक के बायी ओर बेठे हुए देवों की नाली बायीं ओर तथा दाहिनी ओर बैठे हुए देवो की नाली दाहिनी ओर बनावे । जगती के चारों दिशा मे नाली बनावे ॥३६॥ “वामे वाम प्रकुर्वीत दक्षिणे दक्षिणां शुभम् । मण्डपादिषु प्रतिमा येषु युक्त्या विधीयते ॥” अप० सू० १०८ मडप मे जो देव बैठे हो, उनमे मूलनायक के बायी ओर के देवों की नाली बायी ओर तथा दाहिनी ओर के देवों की नाली दाहिनी ओर बनाना शुभ है । पूर्व और पश्चिमाभिमुखदेव— पूर्वापरास्यदेवानां कुर्यान्नो दक्षिणोत्तरम् । ब्रह्मविष्णुशिवाक्रेन्द्र-गुहाः पूर्वापराङ्मुखाः ॥३७॥