भारतकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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द्वितीयोऽध्याय त्रिदेव स्थापना क्रम— रुद्रस्त्रिपुरुषे मध्ये रुद्राद्वामगतो हरिः । दक्षिणाङ्गे भवेद् ब्रह्मा विपर्यासे भयावहः ॥४६॥ त्रिपुरुष प्रासाद मे महादेव को मध्य मे स्थापित करें। उसकी बायीं ओर विष्णु और दाहिनी ओर ब्रह्मा को स्थापित करें। इसमे विपरीत स्थापन करेंगे तो भयकारक होगे ॥४६॥ त्रिदेवों का न्यूनाधिक मान— रुद्रवक्त्रत्रिभागोनो हरिरर्द्धे पितामहः । तत्तुल्या पार्वतीदेवी सुखदा सर्वकामदा ॥४७॥ इति त्रिपुरुषन्यासः । इति श्री सूत्रधार मण्डनविरचिते वास्तुशास्त्रे प्रासादमण्डने जगती- दृष्टिदोपायतनाधिकारे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ शिवमुख का एक तृतीयांश भाग कम करके दो तृतीयांश भाग तक विष्णु की ऊंचाई रक्खे । और विष्णु के मुखाद्धं भाग तक ब्रह्मा की ऊंचाई रक्खें । ब्रह्मा की ऊंचाई के बराबर पार्वती देवी की ऊंचाई रक्खे । यह नियम सुखदायक और सब इच्छितफल देनेवाला है ॥४७॥ अपराजित पृच्छा में भी कहा है कि— “ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्र-स्त्वेकस्मिन् वा पृथग्गृहे । भूयो न्यूनन्यूनतश्च रुद्रो हरिः पितामहः ॥ अंशोनश्च हराद्विष्णु-र्विष्णोरर्धं पितामहः । वामदक्षिणयोगेन मध्ये रुद्रं च स्थापयेत् ॥ संस्थाप्य च शुभं कर्त्ता नृपाद्याः सुजनाः प्रजा । प्रकर्त्तव्यं त्यज विप्राद्याः समे यान्ति समन्वितम् ?॥ ताभ्यां ह्रस्वो यदा रुद्रः क्षयो राज्ञि जने मृतिः । राष्ट्रक्षोभो नृपयुद्धं ब्रह्मविष्णू समौ यदा ॥ अनावृष्टिर्जने मारि-र्ब्रह्मह्रस्वे जनार्दने । विपर्यये नृपाद्याश्च अस्वस्था भ्रमति प्रजा ॥” सूत्र १३६